Saturday, April 23, 2011

अपनी दिशा न भूले मीडिया- निरंकुश न बने लोकप्रिय होती ब्लॉग पत्रकारिता


पत्रकारिता को हमेशा एक आदर्श के रूप में देखा जाता रहा है। जनता की भावनाओं का खुला पृष्ठ होता था पत्रकारिता। मगर आज लगता है स्थितियां बदल गई है। पत्रकारिता जहां प्रिण्ट मीडिया के दायरे से निकल कर रेडियो तक पहुंची तब तक तो सब ठीक था, मगर टीवी चैनलों, इंटरनेट पर वेब-साईट और ब्लॉग पत्रकारिता में घुसे लोगों ने इसे ऐसा आयाम दिया है, जो कतई सुखद नहीं कहा जा सकता। इसमें सुधार लाने के लिए प्रयास किए जाने जरूरी है। हमें निश्चित रूप से पत्रकातिा को स्वस्थ स्वरूप प्रदान करने के लिए पहल करनी चाहिए। इसके लिए पत्रकारिता को बदनाम करने वाली हर हरकत का खुलकर विरोध पत्रकारिता जगत से ही होना जरूरी है। इसके लिए हमें आत्म चिंतन करना चाहिए तथा हर स्थ्िित के बारे में गहराई से सोचना चाहिए।
टीवी पत्रकारिता का सच: ख़बरिया चैनलों में काम कर रहे पत्रकार खुद दुखी हैं। ऐसे पत्रकारों का मानना है कि वे ऐसी स्थिति में हैं कि न तो छोड़ सकते और वहां बने रहना उनके लिए दुश्वार हो गया है। अभिमन्युं की तरह इस पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंसे होने पर उनके प्रति दुख प्रकट किया ही जा सकता है, साथ ही उन्हें अपने व्यवहार में सुधार लाने की सलाह दी जानी भी जरूरी है। हालांकि इन्हीं न्यूज़ चैनलों में कुछ ऐसे पत्रकारों की जमात भी मौजूद है, जो योग्यता के मुकाबले कैसे हैं, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन वे न्यूज़ चैनल के मंच का, उसके ग्लैमर का, उसकी पहुंच का इस्तेमाल कर अपनी छवि भी चमकाते हैं और जब भी जहां भी सार्वजनिक तौर पर बोलने का मौक़ा मिलता है, वहां न्यूज़ चैनलों को गरियाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। उनका यह रूप और चरित्र वास्तविक पत्रकारिता करने वालों को हमेशा परेशान करता है। यह अपने पेशे से एक तरह का छलात्कार है, जो क्षणिक तो मजा देता है, लेकिन पत्रकारिता का बड़ा नुक़सान कर डालता है। ख़ुद की छवि को चमकाने के लिए पत्रकारिता पर सवाल खड़े करने वाले इन पत्रकारों की वजह से दूसरे लोगों को आलोचना का मौक़ा और मंच दोनों मिल जाता है। टीवी मीडिया के उन फंसे अभिमन्युओं को चाहिए कि वे चक्रव्यूह में फंसकर दम तोडऩे के बजाय युद्ध का मैदान छोड़ दें। अगर न्यूज़ चैनलों में उनका दम घुटता है तो वे वहां से तत्काल आज़ाद होकर अपना विरोध प्रकट करें। ऐसे पत्रकार बंधु व्यवस्था का विरोध करना तो दूर की बात, कभी अपनी नाख़ुशी भी नहीं जतापाते। मालिकों के सामने भीगी बिल्ली बने रहने वाले इन पत्रकारों को सार्वजनिक विलाप से बचना चाहिए। यह उनके भी हित में है और पत्रकारिता के हित में भी। किसी भी चीज की स्वस्थ आलोचना हमेशा से स्वागत योग्य है, लेकिन व्यक्तिगत छवि चमकाने के लिए की गई आलोचना निंदनीय है।
बेलगाम होती ब्लॉग पत्रकारिता: ब्लॉग पत्रकारिता का एक नवीनतम आयाम है। ब्लॉग तेजी से अपना वर्चस्व कायम करते जा रहे हैं। ब्लॉग पाठकों की संख्या में बेतहासा ईजाफा इसकी बढती लोकप्रियता को इंगित करता है। हिंदी में ब्लॉग के माध्यम से बड़ा काम हो रहा है। यह बिल्कुल सही बात है कि ब्लॉग और नेट के माध्यम से हिंदी के लिए बड़ा काम हो रहा है, लेकिन कुछ ब्लॉगर और वेबसाइट जिस तरह से बेलगाम होते जा रहे हैं, वह हिंदी भाषा के लिए चिंता की बात है।् ब्लॉग पर जिस तरह से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए ऊलजुलूल बातें लिखी जा रही हैं, वह बेहद निराशाजनक है। कई ब्लॉग तो ऐसे हैं,जहां पहले किसी फ र्जी नाम से कोई लेख लिखा जाता है, फि र बेनामी टिप्पणियां छापकर ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता है। कुछ कमज़ोर लोग इस तरह की ब्लैकमेलिंग के शिकार हो जाते हैं और कुछ ले-देकर अपना पल्ला छुड़ाते हैं। लेकिन जिस तरह से ब्लॉग को ब्लैकमेलिंग और चरित्र हनन का हथियार बनाया जा रहा है, उससे ब्लॉग की आज़ादी और उसके भविष्य को लेकर ख़ासी चिंता होती है। बेलगाम होते ब्लॉग और वेबसाइट पर अगर समय रहते लगाम नहीं लगाई गई तो सरकार को इस दिशा में सोचने के लिए विवश होना पड़ेगा। ब्लॉग एक सशक्त माध्यम है, गाली गलौच और बे सिर-पैर की बातें लिखकर अपने मन की भड़ास निकालने का मंच नहीं।् इस बात पर हिंदी के झंडाबरदारों को गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है। ब्लॉग पर चल रहे इस घटिया खेल पर सभी पत्रकार बंधुओं को विरोध करना चाहिए ताकि हिन्दी पत्रकारिता के इस नए आयाम को एक बेहतर वैश्विक प्रस्तुति के रूप में ताकतवर बनाया जा सके। - सुमित्रा आर्य, सम्पादक
email- editor.sumitra@gmail.com

अपने अधिकारों के प्रति सजग बनें महिलाएं



हाल ही में केन्द्र सरकार ने महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए एक नया कानून बनाया है जिससे महिलाओं की स्थिति मजबूत हुई है। वैसे महिलाओं को कई बार ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनके संदर्भ में वे कानून की मदद ले सकती हैं। पर कानूनी मदद पाने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की ठीक-ठीक जानकारी हो। आइए जानते हैं महिलाओं की समस्याओं और उनसे जुड़े कानूनी पक्षों के बारे में कुछ जानकारी-
विवाह का निजी अधिकार
- यदि आप 18 वर्ष की हो गई हैं तो आपको यह अधिकार मिल जाता है कि जिससे चाहे विवाह कर सकती हैं। इसमें मां-बाप तथा संबंधियों को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
क्यों बदलें शादी के बाद उपनाम
- लड़कियों के लिए यह महत्वपूर्ण मुद्दा होता है कि क्या वह शादी के बाद अपने पति का उपनाम अपनाने के लिए बाध्य हैं? यद्यपि भारत में यह परम्परा है कि शादी के बाद लड़की के पहले नाम के साथ उसके पति का नाम तथा उपनाम जुड़ जाता है और वह इसी नाम से जानी जाती है। लेकिन यदि लड़की शादी के बाद अपना पहले का परिचय नहीं बदलना चाहती तो कानूनन वह अपना पुराना नाम और पदवी रख सकती है। बहुत सी कामकाजी महिलाएं अपने नाम से ही जानी जाती हैं। वे अपनी निजी पहचान बनाए रखना चाहती हैं। इस तरह शादी के बाद यदि कोई लड़की अपने पति का नाम तथा उपनाम अपने नाम के साथ नहीं लगाना चाहती तो उसे यह अधिकार है कि वह अपने पुराने नाम से ही जानी जाए। ऐसी परिस्थिति में लड़की को शादी के बाद एक एफिडेविट देना होता है कि उसकी शादी फलां व्यक्ति से हुई है तथा शादी के बाद वह अपना पुराना नाम ही कायम रखना चाहती है।
स्त्री-धन पर खुद का अधिकार
- शादी के बाद लड़की को एक और महत्वपूर्ण अधिकार मिलता है वह यह कि जो भी गहने तथा पैसे वह अपने मां-बाप या ससुराल पक्ष से पाती है, उस पर उसका स्वयं का अधिकार होता है। इस बात के लिए वह बाध्य नहीं है कि तलाक की स्थिति में यह धन वह अपने पति या सास-ससुर अथवा मां-बाप को वापस करे।
बच्चे की कानूनी संरक्षक
- लड़की का अन्य अधिकार यह है कि यदि उसके पति की मौत हो जाती है या उसका तलाक हो जाता है तो वह बच्चे का संरक्षक बनने का दावा कर सकती है। अभी तक औरतों को बच्चों का संरक्षक बनने का अधिकार नहीं मिला था। लेकिन अब यह अधिकार उन्हें मिल गया है।
- यदि पति बच्चे को प्राप्त करने के लिए कोर्ट में पत्नी से पहले अपनी याचिका दायर करता है तो भी पत्नी को दावा करने और बच्चे को प्राप्त करने का अधिकार है। औरतों को मिला यह एक महत्वपूर्ण अधिकार है।
प्रताडऩा पर पति के खिलाफ रिपोर्ट
- यदि औरत अपने पति या ससुरालवालों के द्वारा प्रताडि़त की जाती है तो उसे भारतीय दंड संहिता के तहत उनके खिलाफ आपराधिक रिपोर्ट लिखवाने का अधिकार है।
तलाक का अधिकार
- हिन्दू विवाह कानून के मुताबिक निम्नलिखित कारणों से महिलाएं विवाह-विच्छेद के लिए अर्जी दे सकती हैं-
- अगर पति ने पूर्व पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह कर लिया हो।
- अगर पति ने पत्नी को त्याग दिया हो और कहीं और रहते हुए उसे दो वर्ष से ज्यादा हो चुका हो।
- अगर पति-पत्नी पर मानसिक या शारीरिक या दोनों तरीकों से जुल्म करता हो।
- अगर पति धर्मभ्रष्ट हो चुका हो या उसने धर्म परिवर्तन कर लिया हो।
- अगर पति किसी लाइलाज रोग का शिकार हो।
- सुमित्रा आर्य, सम्पादक

एसबीबीजे से उठ रहा है लोगों का विश्वास... किसी भी खाते से कोई भी उठा सकता है मनचाही रकम


नसीराबाद (निर्भीक समाचार सेवा)। स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर ने अपने यहां खोले गए एक बैंक खाते को इस तरह का रूप दे दिया कि उसमें से कोई भी व्यक्ति जब चाहे रूपये निकाल सकता है, और मर्जी आए तब जमा करवा सकता है। यह कोई आश्चर्य नहीं है, हकीकत है और इस हकीकत को अंजाम दिया है एसबीबीजे की नसीराबाद शाखा ने। यहां लोगों में यह आम चर्चा है कि इस बैंक में अब बचत खाते, चालू खाते और सावधि जमा खाते के अलावा यह एक नया प्रकार सार्वजनिक बैंक खाता भी खोला जाने लगा है। किसी के भी खाते से कोई भी रूपये निकाल ले और खाताधारी को खबर तक नहीं लगे और ता और उसे मांगे जाने के बावजूद कोई जानकारी तक नहीं दी जावे तो इस बैंक से ग्राहक का पूरा भरोसा ही उठ जाता है।
31 सालों से था बचत खाता
एसबीबीजे की इस शाखा में 31 साल पहले एक खाता खुलवाया था, यहां के डी.ए.वी. स्कूल के प्रधानाध्यापक मदनलाल गर्ग ने। गर्ग यहां के जाने-माने वकील के अलावा शिक्षाविद भी है। इस समय वे 83 साल के हैंं। विद्यालय से उनकरी सेवानिवृति 1988 में हुई। वे अपने अध्यापन काल से लेकर रिटायरमेंट के बाद तक भी इस खाते में लगातार अपनी बचत की सारी राशि जमा करवाते रहे, ताकि कभी वक्त-जरूरत और बुढापे में काम आवे।
केवल जमा ही करवाया हमेशा
इन मितव्ययी व्यक्ति ने अपने खाते में से कभी भी राशि निकालने के बजाये हमेशा राशि जमा करवाते रहे। उन्होंने कभी चैक बुक तक नहीं प्राप्त की।
बिना निकाले हुआ खाता साफ
इस जमाकर्ता को अचानक 2003 में जानकारी मिली कि उनके खाते को साफ किया जा चुका, उसमें अब कोई खास बैलेन्स नहीं बचा है, तो वे एकबारगी तो सकते में आ गए।
पसीने आ गए खाते की जानकारी तक लेने में
इसके बाद उन्होंने अपने खाते का पूरा विवरण जानने के लिए सैंकड़ों बार प्रयास किए, परन्तु बैंक अधिकारियों ने उन्हें कोई सहयोग नहीं किया। बैंक की मांग पर उन्होंने 150 रूपये की शुल्क भी जमा करवाया, फिर भी उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई। जब बैंक के उच्चाधिकारियों, बैंक्रिग लोकपाल, सूचना आयोग तक अपीलें दाखिल की, तब कहीं जाकर करीब छह सालों बाद बैंक ने तीन-चार किश्तों में खाते का विवरण तो उपलब्ध करवाया, परन्तु अभी तक यह नहीं बताया गया कि उनका निजी खाता संयुक्त खाता कैसे बन गया?
बिना जानकारी बना दिया संयुक्त खाता
यह बचत खाता संख्या 10348 को बैंक ने बिना खातेदार की जानकारी के संयुक्त खाता बना डाला और यहीं तक मामला सीमित नहीं रहा, इस खाते को एक तरह से सार्वजनिक खाता तक बना दिया गया और बरसों से बैंक उसे इस रूप में संचालित भी कर रहा था।
किस-किस के नाम जुड़े और कटते रहे खाते में
खुद बैंक के कथनानुसार उक्त खाता (बैंक की मर्जी से ही सही) 19 अगस्त 1989 को संयुक्त खाते के रूप में बदला जाकर किसी वी.के.गर्ग का नाम भी उसमें जोड़ दिया गया था। इस वी.के.गर्ग की मृत्यु 15 फरवरी 2004 को हो चुकी। लेकिन इस बैंक खाते की वास्तविकता यह है कि इसमें से तथाकथित संयुक्त खातेदार की मृत्यु से पहले और बाद में भी कुछ अन्य लोगों द्वारा भी लेदेन किया जाता रहा था।
बैंक नहीं बताता अज्ञात लोगों के नाम
मदनलाल गर्ग के इस बैंक खाते में फर्जी तरीकों से अनेक लोग रूपये निकालने, जमा कराने का काम करते रहना बताया गया है। इसमें कूट-रचना द्वारा 19 अगस्त 1989 को किसी वी.के.गर्ग का नाम संयुक्त किए जाने से पहले भी अनेक लागों ने इसमें से रूपये निकाले थे, और संयुक्त नाम जोड़े जाने के बाद भी अज्ञात लोग भी इसमें लेनदेन करते रहे। आश्चर्य है कि वी.के.गर्ग की मौत 15 फरवरी 2004 के बाद भी अनेक लोग इसमें से रूपये निकालत-डालतेे रहे हैं।
बैंक अधिकारियों की चुप्पी क्यों?
अपने खाते से राशि निकालने वाले लोगों की जानकारी बैंक के रिकॉर्ड से दिए जाने की मांग पिछले सात सालों से लगातार खाताधारी मदनलाल गर्ग करते रहे हैं, मगर बैंक अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। लगातार लिखापढी का क्रम जारी रखते हुए अभी हाल ही में उन्होंने फिर एक रजिस्टर्ड पत्र बैंक अधिकारियों को देकर जानकारी मांगी है, परन्तु 14 सितम्बर 2010 से अब तक अधिकारियों ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी है।

सुजला महाविद्यालय: स्नातकोत्तर शिक्षण के बावजूद दो जिलों में फंसी कालेज का कौन बने धणी-धोरी

लाडनूं व सुजानगढ शहरों के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 65 पर जसवंतगढ की जमीन पर सम्पूर्ण सुजला नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र में स्नातकोत्तर शिक्षा के प्रमुख केन्द्र के रूप में सुस्थापित सुजला महाविद्यालय के नाम से मशहूर राजकीय महाविद्यालय, सुजानगढ का वर्तमान स्वरूप कई मोड़ों से गुजरने के बाद निखरा है। सुजानगढ के ज्ञानीराम हरकचन्द सरावगी कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय और लाडनूं के सेठ मोतीलाल बैंगानी विज्ञान महाविद्यालयों को मिलाकर एकरूप में गठित यह महाविद्यालय आज एक विशाल रूप ले चुका है।
ज्ञानीराम हरकचंद सरावगी महाविद्यालय का सफर
सन 1968 में सुजानगढ कस्बे में ज्ञानीराम हरकचंद सरावगी कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय का गठन किया गया था। इसे अपने शैशवकाल में सुजानगढ के भंवरलाल काला बाल-मंदिर में मात्र 66 विद्यार्थियों की अल्प संख्या के साथ कला एवं वाणिज्य की प्रथम वर्ष स्नातक की कक्षाओं से शुरू किया गया था। इसके बाद 1 जुलाई 1969 में इस महाविद्यालय को राजाजी की कोठी, सुजानगढ में स्थानान्तरित किया गया। बाद में 28 जनवरी 1974 को इसे जसवंतगढ में निर्मित वर्तमान भवन में स्थानान्तरित किया गया, तब से यह निरन्तर यहां चल रहा है। जब इस महाविद्यालय का शिलान्यास किया गया था, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखडिय़ा यहां हेलिकॉप्टर से आए थे। सुजानगढ विधायक फूलचंद जैन के समय में यहां लाडनूं, सुजानगढ, जसवंतगढ और आस-पास ही नहीं सुदूर क्षेत्रों से लोग इस निर्जन स्थान पर पहुंचे और हजारों की संख्या में इस शिलान्यास समारोह में शिरकत की। रेैले के रैले बढते लोगों में उस समय अपार हर्ष देखा गया था।
सेठ मोतीलाल बैंगानी विज्ञान महाविद्यालय का सफरनामा
सत्र 1968-69 में सेठ मोतीलाल बैंगानी विज्ञान महाविद्यालय का प्रारम्भ किया गया था। शुरू में इस महाविद्यालय क ी अध्ययन-व्यवस्था लाडनूं की राजकीय जौहरी उच्च माध्यमिक विद्यालय में शुरू की गई थी। बाद में इसका एक अलग भवन जसवंतगढ की जमीन पर उचित स्थान जानकर बनाया गया। अपने इस नए भवन में यह विज्ञान महाविद्यालय सफलता-पूर्वक चलता रहा। इसमें छात्र संख्या भी बढी। जसवंतगढ ग्राम से जसवंतगढ रेलवे स्टेशन जाने वाली सड़क के एक तरफ कला व वाणिज्य महाविद्यालय था, तो उसके दूसरी तरफ विज्ञान महाविद्यालय एकदम आमने-सामने स्थापित थे, इससे पढने वाले छात्रों में भी परस्पर सामंजस्य रहता था। उस समय लाडनूं व सुजानगढ और जसवंतगढ क्षेत्रों से कॉलेज में पढने वाले सभी छात्र प्राय: साईकिलों से आवागमन करते थे। लाडनूं से जसवंतगढ जाने वाली सड़क को कॉ्रस करके बाईपास रोड स्व. दीपंकर शर्मा के विधायक-काल में बनाई गई थी, जा कालेज के बिलकुल पास से गुजरती थी और एससे आने जाने वाले विद्यार्थियों का मार्ग छोटा होने से समय कम लगता था। कालान्तर में खुत-मालिको ने इस सड़क मार्ग को धीरे-धीरे बंद करके अपने खेतों में मिला लिया।
दोनों महाविद्यालयों का एकीकरण
अपने शुरूआती करीब डेढ दशक तक ये दोनों महाविद्यालय प्रशासनिक एवं अध्यापन की दृष्टि से बिलकुल पृथक-पृथक संचालित किए जाते रहे। बाद में प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से राज्य सरकार ने आदेश जारी करके 1 जनवरी 1982 को दोनों महाविद्यालयों को एकीकृत कर दिया। इसप्रकार दोनों महाविद्यालय संयुक्त होकर एक ही व्यवस्था के अन्तर्गत आ गए। इस राजकी महाविद्यालय में कला, वाणिज्य व विज्ञान तीनों संकाय की कक्षाएं संचालित होने व प्रशासनिक एकरूपता होने से छात्रों के लिय सुविधाजनक हो गया।
स्नातकोत्तर तक क्रमोन्नयन
महाविद्यालय में पढने वाले छात्रों की निरन्तर बढती संख्या और सम्पूर्ण सुजलांचल से स्नातकोत्तर करने की उठती मांग के मद्देनजर इस महाविद्यालय में वाणिज्य व विज्ञान संकायों में स्नातकोत्तर तक शिक्षा की सुविधा राज्य सरकार ने मंजूर करते हुए उपलब्ध करवा दी।यहां स्नातक स्तर पर प्रथम वर्ष प्रवेश के लिए कुल 550 सीटों की व्यवस्था उपलब्ध, जिसमें इस वष्र कुछ बढोतरी की गई है। इनमें राजकीय नियमानुसार अजा को 16 प्रतिशत, अजजा को 12 प्रतिशत, ओबीसी को 21 प्रतिशत आरक्षण प्रवेश में उपलब्ध है। वर्तमान में इस महाविद्यालय में कुल 1600 नियमित छात्र अध्ययनरत हैं। इस केन्द्र पर करीब 2500 से 3000 छात्र स्वयंपाठी रूप में परीक्षाएं देते हैं।
महाविद्यालय में सुविधाएं
महाविद्यालय में अलग-अलग विषयों के अध्यापन हेतु 20 व्याख्याता कार्यरत है। यहां मौजूद पुस्तकालय में करीब 40 हजार पुस्तके विभिन्न विषयों से सम्बंधित मौजूद हैं। इसमें 20 प्रकार की विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं नियमित रूप से आजी हैं, जिनसे छात्र नवीनतम जानकारियां प्राप्त करके अपना ज्ञानवद्र्धन कर सकते हैं। महाविद्यालय में सुसज्जित कम्प्यूटर लैब. एवं रासायनिक व जैविक प्रयोगशाला भी उपलब्ध है। शैक्षेणेत्तर गतिविधियों में यहां एन.सी.सी., युवा विकास केन्द्र, एन.आर.सी.सी. का संचालन भी किया जाता है।
प्रमुख समस्याएं
यह महाविद्यालय सुजलांचल के आम लोगों का प्यार समेटे हुए होने के साथ ही उत्कृष्ट परीक्षा-परिणाम भी देता आया है। परन्तु अनेक समस्याएं ऐसी भी हैं, जिनके कारण विद्यार्थी अपने नियमित अध्ययन में अनेक परेशनियों का सामना करने पर मजबूर हैं।
बस-स्टेण्ड की जरूरत: लाडनूं, जसवंतगढ और सुजानगढ तीनों शहरों से दूर निर्जन स्थान पर अवस्थित होने से यहां आने-जाने वाले छात्रों को आवागमन की परेशानियां प्रतिदिन झेलनी पड़ती हैं। ग्राम कसुम्बी, लैड़ी, रोडु, निम्बी जोधां, तंवरा, दुजार, बाकलिया, छापर, चाड़वास, सालासर आदि सैंकड़ों गावों से रोजमर्रा आने वाले छात्रों को भी कॉलेज के सामने बसें नहीं रूकने से काफी परेशान होना पड़ता है और उसका असर उनकी पढाई पर भी पड़ता है। इसके समाधान के रूप में मेगा हाई वे और एन.एच. 65 के क्रास पर बस स्टेण्ड घोषित करके इस समस्या का समाधान अवश्य करना चाहिए।
शुद्ध पेयजल का अभाव: क्षेत्र के प्रसिद्ध पाबोलाव तालाब और जोधानाडा तालाबों के बीच में स्थित होने के बावजूद कॉलेज में अध्ययन करने वाले छात्रों को शुद्ध पीने का पारी नसीब नहीं हो पाता है। जन-प्रतिनिधि और कालेज प्रशासन दोनों ही इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर से आंखें मूंदे हुए हैं। जबकि यह सर्वाधिक प्राथमिकता वाली समस्या है। कालेज प्रशासन इस कालेज को चूरू जिले का मानने के कारण चूरू जिले के प्रशासन को इस सम्बंध में लिखता है, जबकि यहां सारा प्रशासनिक नियंत्रण नागौर जिले का लागू होता है। अब इन दो जिलों के बीच फंसी इस कालेज को सुविधाएं उपलब्ध कराए तो आखिर कौन?
-लोकेश नाहर,
कलम कला संवाददाता

कृषि-मंत्री की घोषित सम्पति 306 बीघा कृषि भूमि और 9042 गज में 5 मकान



जयपुर (कलम कला न्यूज)। राजस्थान सरकार के सभी मंत्री अपनी-अपनी सम्पति की घोषणा विधिवत कर चुके हैं। लाडनूं क्षेत्र से विधानसभा के लिए निर्वाचित ओर राज्य सरकार की केबिनेट में कृषि और पशु-पालन विभागों की कमान संभाले हुए कृषि मंत्री हरजीराम बुरड़क ने भी अपनी और अपनी पत्नी के नाम की कुल सम्पति की घोषणा की है।
इस घोषणा के अनुसार कृषि मंत्री के स्वयं व उनकी पत्नी के नाम से कुल 306.25 बीघा कृषि भूमि ग्राम भरनावां, हुडास, लाडनूं व झरडिय़ा में मौजूद है। दोनों के पास कुल नकद राशि 3 लाख 19 हजार 200 रूपये हैं। पत्नी के पास शायद कोई बैंक खाता नहीं है, क्योंकि उसका कोई भी उल्लेख नहीं किया गया है। उनके खुद के बैंक खाते में 3 लाख 87 हजार 677 रूपये की जमा राशि बताई गई है। दोनों पति-पत्नी के पास कुल सोना 410 ग्राम व चांदी 2 किलो है। कृषि मंत्री के खुद के पास कुल 5 मकान हैं, जिनमें जयपुर स्थित दो मकानों सहित कुल 9042 वर्ग गज भूमि पर इन पांचों मकानों का निर्माण किया गया है।
कुल घोषित की गई सम्पति का विवरण इस प्रकार बताया गया है-
खुद के नाम की सम्पति:
धनराशि-
खुद के नाम नकद राशि - 69 हजार 500 रू.
बैंक में जमा राशि - 3 लाख 87 हजार 677 रू.
विभिन्न कम्पनियों के शेयर - 95 हजार 500 रू.
सोना - 110 ग्राम
कृषि भूमि-
भरनावां में कृषि भूमि - 73 बीघा
हुडास में कृषि भूमि - 139.75 बीघा
लाडनूं में कृषि भूमि - 5 बीघा
मकान-
जयपुर के विधानसभा नगर में मकान- 542 गज भूमि में
जयपुर में सी-10, इमली फाटक पर आवासीय मकान- 300वर्ग गज भूमि में
लाडनूं में स्टेशन रोड पर आवासीय मकान- 1818 वर्ग गज भूमि में
भरनावां में पुश्तैनी मकान- 6058 वर्ग गज भूमि में
जोधपुर के हाउसिंग बोर्ड में मकान- 324 वर्ग मीटर प्लंथ लेबल में
पत्नी के नाम की सम्पति:
नकद राशि - 2 लाख 49 हजार 700 रू.
शेयर - 9 हजार 300 रू.
सोना - 300 ग्राम
चांदी - 2 किलोग्राम
झरडिय़ा में कृषिभूमि - 88.5 बीघा

कपाल पीठ: गोठ मांगलोद.... दधिमन्थन से पैदा हुई दधिमती माता: दूध से होता है जिनका अभिषेक.


हमारी पुण्य भूमि मातृभूमि जो भारत भूमि के नाम से जानी जाती हेै, इसमें सभी तीर्थ स्थान ऐसे हैं जहां जाने से प्रत्येक मनुष्य का तन-मन पवित्र हो उठता हैऔर नवजीवन का संचार होता है। पुराणों में 51 महाशक्ति पीठ व 26 उप पीठों का वर्णन मिलता है, इनको शक्ति पीठ या सिद्ध पीठ भी कहते हैं। इनमें से एक दधिमथी पीठ है, जो कपाल पीठ के नाम से भी जानी जाती है। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली त्रिनेत्रा भगवती, जो हाथों में चमकीला चक्र, तलवार, धनुष-बाण, अभय मुद्रा, कमल और त्रिशूल धारण किए हुए हैं, जो मोतियों के हार और कुण्डल से युक्त हैं, वह सिंह-वाहिनी वर देने वाली सर्वोत्कृष्टा पूजने योग्य दधिमथी माता सदा मंगल करे।
दधिर्भक्त जनान धात्री मथी तदरिमाथिनी।
देवी दधिमथी नाम धन्वदेशे विराजते।।
देवी का प्राकट्य, मंदिर की स्थिति व निर्माण का वर्णन
दधिमथी का मंदिर पुष्कर अजमेर के उत्तर में 32 कोस पर स्थित है, जो नागौर जिले की जायल तहसील मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर गोठ व मांगलोद गांवों के बीच है।
त्रेता युग में अयोध्यापति राजा मान्धाता ने यहां एक सात्विक यज्ञ किया। उस समय माघ शुक्ला सप्तमी थी, देवी प्रकट हुई, जो दधिमथी के नाम से जानी जाती है। शिलालेख उके अनुसार इसका निर्माण गुप्त सम्वत् 289 को हुआ, जो करीब 1300 वर्षों पूर्व मंदिर शिखर का निर्माण हुआ। सम्वत 608 में 14 दाधीच ब्राह्मणों द्वारा 2024 तत्कालीन स्वर्ण-मुद्राओं से इसका गर्भग1ह व 38 स्तम्भों का निर्माण हुआ।
इतिहास-विशेषज्ञों व पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को लगभग 2000 वर्ष प्राचीन माना है। 1908 के शिलालेख के अनुसार दाधीच-कुलभूषण सिद्व-ब्रह्मचारी बुढादेवल निवासी श्री विष्णुदास जी महाराज की आज्ञा से उदयपुर राजा स्वरूपसिंह जी ने चौक व तिबारे, दरवाजे, यात्री-निवास, बावड़ी, मंदिर आदि का निर्माण करवाया।
देवी के वर्तमान मंदिर की मूर्ति के बारे में कहते हैं कि जब देवी प्रकट हो रही थी, तभी वहां ग्वाला गाय चरा रहा था, जमीन के फटने से वहां गर्जना हुई। उसी के साथ देवी का कपाल बाहर निकला, गाएं भागने लगी तब ग्वाला ने कहा- माता ढबजा। उसके कहने से भगवती का कपाल ही बाहर आया। उस समय गायों के दूध से उसका अभिषेक किया गया। आज भी पूरे भारत में यह दधिमथी माता का एक ही मंदिर है, जहां दूध से अभिषेक होता है।
पूजा, उत्सव और मेले
मंदिर के चौक में से शिव परिवार व हनुमान जी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर का शिखर बहुत ऊंचा है तथा यहां अधर-खम्भ की महिमा है। जिस दिन ये दोनो पाट बराबर चिपक जाएंगे, उस दिन प्रलय की स्थिति होगी। गर्भगृह में विभिन्न प्रकार की मूर्तियां लगी हुई है। यहां प्रत्येक नवरात्रों में चैत्र व आसोज में मेला लगता है, जो पूरे नौ दिनो तक चलता है। इसमें पूरे भारत-वर्ष के दाधीच बन्धुओं के अलावा सभी वर्गों के लोग आकर मां के दर्शन करते हैं। नवरात्रों के अलावा कार्तिक सुदी अष्टमी, गोपाष्टमी को अन्नकूट महोत्सव व माघ सुदी सप्तमी को प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। वर्ष भर दर्शनार्थी आते हैं।
इस मंदिर की सेवा-पूजा पहले दाधीच ब्राह्मण करते थे, लेकिन कुछ समय बाद पास के गांव दुस्ताऊ के पाराशर ब्राह्मणों को बारी-बारी से सेवा-पूजा के लिए अधिकृत किया, जिसका उनको मंदिर समिति की ओर से पारिश्रमिक दिया जाता है। मंदिर की व्यवस्था हेतु जागीरदारों द्वारा जमीन दी गई, जिसके लगान के रूपये माताजी के मंदिर को मिलते हैं। यहां आस-पास जिप्सम निकलती है, उसके लगान के रूपये भी माताजी के मंदिर को मिलते थे, जो आजादी मिलने के बाद खनिज विभाग ने लगान बंद कर दिया।
मंदिर-स्थल की व्यवस्थाएं और आवागमन
यात्रियों के ठहरने के लिए यहां कमरे आदि का निर्माण हुआ है, पास में दधिमथी सेवायतन नाम से धर्मशाला भी बनाई गई है। मंदिर का जीर्णोद्धार करार्य चल रहा है, उसमें निज मंदिर का जीर्णोद्धार पूरा हुआ है। उसमें करीब एक करोड़ रूपये खर्च हुए हैं। यह खर्च अधिकांश दाधीच ब्राह्मणों ने मिलकर किया है। अन्य कार्य हेतु भारत सरकार व राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग के सहयोग से किया जायेगा। यहां पिछले कई वर्षों से वेद विद्यालय भी चल रहा है, जिसमें ब्राह्मण वर्ग के बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसका संचालन आचार्य श्री किशोर जी व्यास वेद प्रतिष्ठान पूना द्वारा किया जा रहा है।
मंदिर में पहुंचने के लिए विभिन्न स्थानों से रेल, बस, टैक्सी आदि से आसानी से पहुंचा जा सकता है। जयपुर, जोधपुर, अजमेर, बीकानेर,दिल्ली, नागौर से डेगाना, छोटी खाटु आदि से रेल द्वारा और उसके बाद टेक्सी या बस द्वारा पहुंचा जा सकता है।
मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था मंदिर प्रन्यास व अखिल भारतीय दाधीच ब्राह्मण महासभा द्वारा की जाती है।
दघिमती माता के बारे में पौराणिक कथा
श्री दुर्गाशप्तशती मार्क ण्डेय पुराण का ही एक प्रमुख अंश है। इसमें देवी भगवती दुर्गा की कथा विस्तृत रूप में वर्णित है। इसमें देवी ने कहा है कि जब जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, अत्याचार बढेगा, धर्म की हानि होगी, हिंसा का प्रभाव बढेगा, तब-तब साधु-संतों की रखा, दुष्टों का संहार, वेदों का संरक्षण करने के लिए मैं प्रत्येक युग में ईश्वरीय शक्ति का अवतार लूंगी।
इत्थ यदा यदा बाधा दानवी स्था भविष्यति।
तदा तदावतीर्या हं करिष्याम्यरि संक्षयम्।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थितो।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
प्राचीनकाल में महा-बलवान देवता राक्षसों से अमृत लेने के लिए समुद्र-मंथन में असमर्थ हुए, तब महामाया भगवती की प्रार्थना की। तभी विराट् रूप में महामाया प्रकट हुई और उसी दिन से ब्रह्मा ने कहा कि दधिमन्थन के कारण तुम दधिमथी के नाम से प्रसिद्ध होगी। विष्णु तेरे पति, अथर्वा मुनि तेरे पिता, दधिची तेरे भाई व अथर्वा-पुत्र दधिची के पुत्रों की कुलदेवी होगी।
दधिमती का पूजन
दधिमती का पूजन दधिमती मंत्र के यंत्र द्वारा किया जाता है-
ऊँ ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौ: भगवते दधिमथ्यै नम:
भारतीय संस्कृति में शक्ति को देवी अर्हता प्राप्त है।
दधिमथ्यै नमस्तुभ्यं
नमस्यै लोकधारिणी।
विश्वेश्वारि नमस्तुभ्यं
नमोथर्वण कन्य के।।
लेखक:- देवदत्त शर्मा (छोटी खाटु वाले), जयपुर
सम्पर्क: 9414251739, 0141-2630466, 2615835

कपाल पीठ: गोठ मांगलोद--- दधिमन्थन से पैदा हुई दधिमती माता... दूध से होता है जिनका अभिषेक.


Sunday, March 6, 2011

सात साल बाद मिलेंगे 15 नए राष्ट्रीय राजमार्ग

लाडनूं को मिलेगा एक और हाई-वे
जयपुर। प्रदेश को करीब सात वर्ष बाद नए राष्ट्रीय राजमार्ग मिलने की उम्मीद बंधी है। राज्य सरकार ने पिछले दिनों 3515 किमी के 15 संशोघित प्रस्ताव केन्द्र को भेजे हैं। उम्मीद है कि इनमें से करीब 1500 किमी सड़कों को कुछ दिनों में राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित कर दिया जाएगा। सूत्रों के अनुसार नए राष्ट्रीय राजमार्गो के लिए केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी ने राज्य सरकार को कुछ सुझाव दिए थे।
जोशी चाहते थे कि आदिवासी, दूरदराज, रेगिस्तानी, माइनिंग, सीमेंट उत्पादन, नए पर्यटन क्षेत्रों को विशेष रूप से जोडऩे वाले प्रस्ताव भेजे जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक निर्माण विभाग ने संशोघित प्रस्ताव बनाए। ये प्रस्ताव जल्द केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के समूह के समक्ष रखे जाएंगे। इससे पहले सार्वजनिक निर्माण विभाग ने 2009 में करीब 2200 किमी सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने के प्रस्ताव भिजवाए थे। 2004 के बाद प्रदेश में एक भी नया राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित नहीं हुआ है।
लाडनूं को एक और हाई-वे
लाडनूं से राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 65 पहले से ही गुजर रहा है। किशनगढ से हनुमानगढ मेगा हाई-वे भी लाडनूं होकर गुजर रहा है और अब लाडनूं होकर पाली जिले के भीम तक 253 किलोमीटर लम्बा राजमार्ग फिर राज्य सरकार ने प्रस्तावित किया है। लाडनूं से खाटू-डेगाना-मेड़ता सिटी-लाम्बिया-जैतारण-रायपुर होकर भीम जाने वाले इस मार्ग के निकलने से इस क्षेत्र को विकास के नए आयाम मिलेंगे। इसी प्रकार इस क्षेत्र के प्रसिद्ध सालासर धाम के नेछवा, सीकर, नीम का थाना होते हुए कोटपूतली, अलवर व भरतपुर से जुड़ जाने से भी काफी सुविधाएं मिल सकेंगी। इधर नागौर को भी जयपुर उसे वाया कुचामन होते हुए सीधा फलौदी से जोड़ा जा रहा है।
इनका कहना है
मैं और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नए राष्ट्रीय राजमार्गो के लिए केंद्रीय मंत्री सी.पी.जोशी से मिले थे। इसके बाद नए प्रस्ताव भिजवाए हैं।
-प्रमोद जैन भाया,
सार्वजनिक निर्माण राज्यमंत्री
इस बार भेजे गए इन सड़कों के प्रस्ताव
1. बूंदी-बिजोलिया-लाडपुरा-भीलवाड़ा-गंगापुर-राजसमन्द
- 210 किमी
2. उनियारा-नैनवा-हिण्डौली-जहाजपुर-शाहपुरा-गुलाबपुरा
- 213 किमी
3. पाली-देसूरी-गोमती चौराहा-वाया नाडोल -93 किमी
4. उदयपुर-झाड़ोल-सोम-नालवा-दाईया-इदर
-108 किमी
5. लाम्बिया-रास-ब्यावर-बदनोर-आसींद-माण्डल -148 किमी
6. मथुरा-भरतपुर-बयाना-भाड़ोती-सवाई माधोपुर-इटावा-मांगरोल-बारां - 304 किमी
7. मावली-भांसोल-ओडन-खमनोर-हल्दीघाटी-कुंभलगढ़-चारभुजा -130 किमी
8. रतलाम-बांसवाड़ा-सागवाड़ा-डूंगरपुर-खेरवाड़ा-कोटड़ा-स्वरूपगंज - 310 किमी
9. जयपुर-जोबनेर-कुचामन-नागौर-फलौदी -366 किमी
10. लाडनूं-खाटू-डेगाना-मेड़ता सिटी-लाम्बिया-जैतारण-रायपुर-भीम - 253 किमी
11. मन्दसौर-प्रतापगढ़-धरियावाद-सलूम्बर-डूंगरपुर-बिच्छीवाड़ा -164 किमी
12. श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़-नोहर-भादरा-राजगढ़-झुंझुनू-उदयपुरवाटी-अजीतगढ़-शाहपुरा
- 474 किमी
13. रेवाड़ी- नारनौल-पचेरी-चिड़ावा-झुंझुनू-फतेहपुर
-123 किमी
14. भरतपुर-डीग-अलवर-बानसूर-कोटपूतली-नीम का थाना-सीकर-नेछवा-सालासर
- 301 किमी
15. कोसी-कामां-डीग-भरतपुर-रूपवास-धौलपुर -133 किमी
16. स्वरूपगंज-सिरोही-जालोर-सिवाणा-बालोतरा - 215 किमी

लाडनू बना तेरापंथ की raajdhaanee

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लाडनूं तेरापंथ की राजधानी घोषित

आचार्य महाश्रमण के तीन दिवसीय प्रवास ने बदली लाडनूं की फिजां

लाडनूं (कलम कला न्यूज)। तेरापंथ धर्मसंघ के 11 वें आचार्य महाश्रमण ने लाडनूं को तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी के रूप में घोषित किया है। इससे पूर्व नौंवें आचार्य गुरूदेव तुलसी ने लाडनूं को तेरापंथ का केन्द्र बनाने का भरसक प्रयास किया था, लेकिन वे इसे राजधानी के रूप में इतना खुला घोषित नहीं कर पाए थे। लाडनूं आचार्य तुलसी का जन्म-स्थान है और आचार्य तुलसी के जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर लाडनूं को तेरापंथ का गढ घोषित किए जाने से लोगों को अपार हर्ष का अनुभव हुआ है। आचाय्र महाश्रमण के साथ युवाचार्य के रूप में महाश्रमण यहां से गए थे और उनके देवलोकगमन के बाद आचार्य के रूप में पदारोहण के पश्चात् पहली बार आचार्य महाश्रमण लाडनूं पधारे। लाडनूं वासियों ने पलक पांवड़े बिछाकर उनका स्वागत किया और उनके अल्पकाल के प्रवास का अधिकतम फायदा उठाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों की संरचना इस मौके पर की। जैनविश्वभारती का उन्होंने स्वयं घूमकर एकबार पूरा अवलोकन किया, वहां की एक-एक गतिविधि की जानकारी हासिल की। वे जैनविश्वभारती और उससे सम्बद्ध विश्वविद्यालय से काफी अभिभूत हुए। उन्हें आचार्य तुलसी की परिकल्पना में बहुत दम लगा। वे तुलसी के स्मारक पर भी गए। उन्हें लगा कि यह लाडनूं ही वह स्थान है, जहां तेरापंथ अपना विश्व स्तरीय स्वरूप धारण कर सकता है। उन्होंने अपने अभिनन्दन समारोह में कहा, अब तक सरदारशहर को तेरापंथ की राजधानी माना जाता रहा है, अब लाडनूं नगर राजधानी होगा, इसकी घोषणा करता हूं। लाडनूं के साथ तेरापंथ का बहुत बड़ा इतिहास रहा है। इसके अलावा जैन विश्व भारती, विश्वविद्यालय, विशाल ग्रन्थागार, धर्मोपकरण भंडार, वृद्ध साध्वर सेवा केंद्र, पारमाथिग्क शिक्षण संस्थान, समण श्रेणी यहां मौजूद है।

आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय के तीन खण्डों का लोकार्पण

जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में नवनिर्मित्त आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय भवन, आचार्य तुलसी महिला शिक्षा केन्द्र भवन व आचार्य महाप्रज्ञ केन्द्रीय शैक्षणिक भवन का लोकार्पण करने के पश्चात्ï आयोजित समारोह में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि ज्ञान की आराधना होनी चाहिए, ज्ञान को सर्वोपरि तत्व माना गया है। उन्होंने जैन संस्थाओं से जैन विद्या के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जैन विश्व भारती एवं उससे सम्बद्घ विश्वविद्यालय का तो कत्र्तव्य है कि वह जैन विद्या पर आवश्यक ध्यान दें। उन्होंने सभी तेरापंथ संस्थाओं को परस्पर मनोमालिन्य दूर कर मिलकर काम करने की आवश्यकता बताई तथा कहा कि तभी समाज एवं अन्य लोगों का भला हो सकता है। उन्होंने जैन विश्व भारती को कामधेनु की उपमा देते हुए कहा कि जब तक इसका दोहन नहीं हो, समाज लाभान्वित नहीं हो सकता। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा द्वारा बनाए गए आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय के मुख्य भवन एवं उनसे सम्बन्धित आचार्य तुलसी महिला शिक्षा केन्द्र व आचार्य महाप्रज्ञ केन्द्रीय शैक्षणिक भवन का उद्ïघाटन आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में क्रमश: राजेन्द्र बच्छावत, श्रीमती कुमुद नवरत्नमल बच्छावत व श्रीमती मंगलीदेवी दुधेडिय़ा ने किया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष चैनरूप चिण्डालिया नें बताया कि महासभा अपने संगठन के दायित्व को पूरा करने के साथ शिक्षा के आयाम के प्रति भी सदैव सजग रही है। आचार्य तुलसी के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय के तीन खण्डों के भवन निर्माण का दायित्व भी निर्धारित दस महीनों के समय में महासभा ने पूर्ण किया है। उन्होंने अपने सम्बोधन में इन भवनों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

मुनि महेन्द्रकुमार ने कहा कि आज शिक्षा विभिन्न आयामों में फैलती जा रही है लेकिन उसका मूल केन्द्र गायब है। आंतरिक चेतना और मानवीय मूल्यों के बिना शिक्षा कभी पूर्ण नहीं हो सकती। हमें आंतरिक चेतना का रूपान्तरण करना होगा । उन्होंने जैन विद्वानों को तैयार करने की योजना पर भी प्रकाश डालते हुए जैन दर्शन, जैन साधना व समग्र जैन संस्कृति के उद्घार के लिए आवश्यक बताया। आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या डा. समणी मल्लिप्रज्ञा ने समाज में महिला विकास और महिला शिक्षा की आवश्यकता बताते हुए इस क्षेत्र में तेरापंथ धर्मसंघ की विशेष भूमिका की जानकारी दी।

जैन विश्व भारती के अध्यक्ष सुरेन्द्र चौरडिय़ा ने आचार्य महाप्रज्ञ के करीब साढ़े चार साल पूर्व प्राप्त संदेश का वाचन करते हुए जैन विश्व भारती को आचार्य तुलसी के सपने की कामधेनु बताया व जैन विश्व भारती को विश्वविद्यालय की पितृ संस्था बताया और कहा कि दोनों निरन्तर मिलकर काम कर रहे हैं।

जैन विश्व भारती की कुलपति समणी चारित्रप्रज्ञा ने इस अवसर पर कहा कि आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ कभी सम्प्रदाय में बंधकर नहीं रहे। उनका चिंतन समूचे मानव समुदाय के लिए था। उसी के अनुरूप हम समाज में एक बड़े परिवर्तन का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय की पूर्व प्राचार्या साध्वी ऋतुयशा ने भी संस्था के निरन्तर विकास और विभिन्न बहुआयामी कोर्स शुरू करने की आवश्यकता बताई।

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Saturday, March 5, 2011

शिक्षकों ने मांगा 19 माह का बकाया वेतन

शिक्षकों ने मांगा 19 माह का बकाया वेतन
लाडनूं। स्थानीय निजी शिक्षण संस्था के.बी. प्राथमिक विद्यालय के शिक्षाकर्मियों को करीब 19 महीनों का बकाया वेतन भुगतान नहीं किए जाने को लेकर विद्यालय के कार्मिकों ने एक सामूहिक पत्र जिला कलक्टर एस.एस.बिस्सा को जनसुनवाई चौपाल के दौरान सौंपा।
विद्यालय के कर्मचारियों प्रकाशचंद वर्मा, कमलेशकुमार गुप्ता, जवानसिंह व दीनदयाल शर्मा द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में बताया गया है कि राजकीय अनुदान प्राप्त इस शिक्षण संस्था के कर्मचारियों को जून, 2006 से मार्च, 2007 तक तथा अप्रैल, 2010 से दिसम्बर 2010 तक का वेतन भुगतान नहीं किए जाने से उन पर आर्थिक संकट गिर चुका है। परिवार के सदस्यों का पालन-पोषण तक ढ़ंग से नहीं हो पा रहा है तथा उनके भूखों मरने की नौबत तक आ चुकी।
उन्होंने बकाया 19 माह का वेतन अविलम्ब भुगतान करवाने की मांग की है। जिला कलक्टर ने इस सम्बन्ध में जिला शिक्षा अधिकारी को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

करोड़ों का क्रिकेट सट्टा पकड़ा

करोड़ों का क्रिकेट सट्टा पकड़ा
एस.पी. के निर्देश पर कार्रवाई
लाडनूं। वल्र्ड कप किक्रेट मैचों को लेकर होने वाली करोड़ों की सौदेबाजी पर नियंत्रण के लिए पुलिस अधीक्षक डा.बीएल मीणा के निर्देश पर पुलिस ने छापा मारकर चार जनों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उनके कब्जे से एक लाख 71 हजार 6 00 रूपए नकद, 45 मोबाइल, एक टीवी, कम्प्यूटर, लेपटॉप, टेपरिकॉर्डर, पांच कैसेट व लेनदेन के हिसाब की डायरी व रिकार्डिंग मशीन बरामद की है।
पुलिस उपअधीक्षक गोपाल रामावत ने बताया कि 27 फरवरी रविवार को शहर के विभिन्न क्षेत्रों में क्रिकेट मैचों को लेकर सौदे होने की जानकारी मिलने पर चार दलों का गठन किया गया। पुलिस ने विभिन्न स्थानों पर एक साथ छापामार कार्रवाई की। शहर के दूसरी पट्टी स्थित एक मकान पर छापे में लाडनूं निवासी सौरभ बैद पुत्र रमेशकुमार बैद, भागचंद पुत्र गैंदाराम विश्नोई निवासी नोखा, विशु पुत्र बनवाली बंगाली निवासी गोहाटी व शिव पुत्र सियाराम दर्जी निवासी नोखा को सौदा करते रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। सभी आरोपियों को हिरासत में लेकर उपकरण जब्त कर लिए।
कार्रवाई करने वाली टीम का नेतृत्व जसवंतगढ़ थानाप्रभारी अमराराम विश्नोई ने किया। टीम में अयूब खां, अब्दुल शकील, ओमप्रकाश शर्मा, नवरत्नमल, संजयकुमारी, संजू व हरिराम आदि पुलिसकर्मी शामिल थे। पुलिस की सट्टे के खिलाफ कार्रवाई से शहर में हडकंप मच गया। अनेक सटोरियों को सौदा होने से पहले ही अपने स्थान बदलने पड़ गए। पुलिस ने बताया कि अभियान जारी रहेगा। इस कार्यवाही के दिन स्थानीय थानाधिकारी अवकाश पर बाहर गए हुए थे। बताया जाता है कि कुछ पुलिसकर्मियों की मिलीभगत के चलते इस जुए को पुलिस की ओर से हरी झण्डी मिली हुई थी।

Wednesday, December 9, 2009

महंगाई पर हाथ खड़े करती सरकार!

खाद्य पदार्थों के बेतहाशा महंगे होने के कारण देश के गरीब जो यंत्रणा इन दिनों झेल रहे हैं, ऎसी आजादी के बाद पिछले साठ साल में कभी नहीं देखी गई। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि दाल सौ रूपए किलो हो जाएगी और सब्जियों की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी। उस पर विडम्बना यह है कि आम आदमी का हितैषी होने का दम भरने वाले सत्तारू ढ़ संप्रग में एक भी नेता ऎसा नहीं है, जिसने घोर विपत्ति के इस दौर में गरीब के आंसू पोंछने वाली कोई बात कही हो।

इससे भी अधिक विस्मयकारी बात यह है कि जो लोग और पार्टियां विगत में महंगाई के खिलाफ आंदोलन करती रही हैं और खुद को दलितों व गरीबों का मसीहा बताती हैं, वे भी चुप हैं। जनता की याददाश्त कमजोर हो सकती है, लेकिन 1999 में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में प्याज के दाम अचानक बेहद बढ़ जाने के कारण भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी थी। धड़ेबाजी के कारण बेहद कमजोर हो गई भाजपा ने दिल्ली की सड़कों पर महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन किए जरू र, लेकिन वह प्रतीकात्मक बनकर रह गए।

पिछले सप्ताह लोकसभा में इस मुद्दे पर हुई बहस के दौरान सदन में सदस्यों की नाममात्र की उपस्थिति से साफ हो गया कि हमारे राजनेताओं को गरीब की कितनी चिंता है। शरद पवार जब उत्तर देने के लिए खड़े हुए, तो सदन में केवल 26 सदस्य उपस्थित थे। बहस की शुरूआत करने वाले भारतीय जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव भी उस समय सदन में मौजूद नहीं थे।

देश की एक अरब से अधिक आबादी में से गरीब और दलित, जो असहनीय दुख-तकलीफ झेल रहे हैं, उस पर हुई चर्चा में कृषि मंत्री शरद पवार का योगदान क्या है? उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में महंगाई का सारा दोष राज्य सरकारों के सिर मढ़ कर केन्द्र सरकार को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। इससे ज्यादा शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती। क्या महाराष्ट्र में सरकार कांग्रेस और पवार की पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की नहीं है? क्या आन्ध्र से राजस्थान और हरियाणा तक कई अन्य राज्यों में भी कांग्रेस सत्तारू ढ़ नहीं है?

शरद पवार का केन्द्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के रू प में प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। वे इस पद पर 2004 से हैं, लेकिन इस पूृरे कार्यकाल में उन्होंने मंत्री पद की जिम्मेदारी बहुत लापरवाह तरीके से निभाई है, क्योंकि उनके दिमाग में इससे भी महत्वपूर्ण कई चीजें हैं। उदाहरण के लिए, बेहद लुभावने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का नाम लिया जा सकता है। इसके अलावा एनसीपी के एकछत्र नेता पवार अपनी बेटी सुप्रिया सुले को अपना उत्तराधिकारी बनाने की कोशिश में जोर-शोर से लगे हुए हैं।

चीनी और गन्ने की कीमतों के घोटाले में पवार की निंदनीय भूमिका रही है। इसी के चलते मनमोहन सिंह सरकार को हड़बड़ी में अपना कदम वापस लेना पड़ा। राज्यसभा में विपक्ष के कुछ सांसदों ने बेलगाम महंगाई के बारे में केन्द्र सरकार की निष्क्रियता सम्बन्धी पैने और प्रासंगिक प्रश्न पूछे थे। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पूर्व में कह चुके हैं कि महंगाई को काबू में रखने के लिए युद्धस्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं।

केन्द्र सरकार के संकटमोचक की भूमिका कई बार निभा चुके प्रणव मुखर्जी भी इस बहस के दौरान आपा खो बैठे और माकपा नेता वृंदा करात को जोर-जोर से लताड़ने लगे। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि केन्द्र सरकार महंगाई पर काबू पाने के लिए क्या कदम उठा रही है। उन्होंने न जमाखोरों और न मुनाफाखोरों के बारे में कुछ कहना मुनासिब समझा और न तथाकथित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विफल होने के बारे में कुछ कहा। हालांकि उन्होंने दावा किया कि "सरकार जो कुछ कर सकती है, वह कर रही है।" इसके बाद उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दालों की तीस लाख टन कमी के बारे में वह कुछ नहीं कर सकते। क्या इन हालात में सरकार को समय रहते योजना बनाकर कदम नहीं उठाने चाहिए थे? क्या प्रणव बाबू या शरद पवार बताएंगे कि चीनी के दाम तीन गुने कैसे हो गए, जब तीन महीने पहले ही पवार कह रहे थे कि देश में चीनी की बहुतायत है और उसमें से कुछ का निर्यात भी किया जा सकता है?

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज अमीर और गरीब के बीच की खाई अपूर्व है। वर्ष 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के बाद कुछ लोगों का जीवन-स्तर तो सुधरा है, लेकिन 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो रही, उनके बारे में सोचने की फुर्सत लगता है सरकार में बैठे लोगों को है ही नहीं।
इसी तरह 9 प्रतिशत विकास दर भी प्रशंसनीय है, जो मंदी के इस दौर में चीन की उच्चतम विकास दर के बाद दूसरे नम्बर पर है। लेकिन मुश्किल यह है कि संप्रग सरकार मानती है कि ऊंची विकास दर से गरीब स्वाभाविक रूप से लाभान्वित होंगे, क्योंकि उसका लाभ ऊपर से नीचे तक पहुंचेगा।

गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की तादाद भी कुछ घटी है, लेकिन इस बारे में सरकारी आंकड़े दोषपूर्ण हैं, जिसमें मूल्य सूचकांक से खाद्य पदार्थों को बाहर रखा गया है।

यदि एक डॉलर प्रतिदिन आय को गरीबी रेखा का पैमाना माना जाए, तो गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की तादाद कहीं ज्यादा होगी। आज खाद्य पदार्थों की कीमतें जिस स्तर पर हैं, उनका फिलहाल नीचे आना संभव नहीं लगता, जिसकी वजह से गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को भी मुश्किलें हो रही हैं। आज तो मध्यम वर्ग के भी अनेक परिवार ऎसे हैं, जो दाल-सब्जियां खरीदने की हैसियत में नहीं रहे। उभरते भारत के लिए इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है?

Wednesday, May 6, 2009

वापस लाएं काला धन

स्विस बैंकों में भारत की अवैध रूप से कुल जमाराशि शेष दुनिया के देशों के कुल काले धन से भी ज्यादा है। एक आकलन के अनुसार भारत का 70 लाख करोड रूपया इन बैंकों में जमा है। अमरीका की तरह अगर यह राशि भारत में वापस आ जाती है तो देश के हर गरीब परिवार को 10 लाख रूपए मिलेंगे। आर्थिक मंदी और बराक ओबामा की ऎतिहासिक सफलता ने दुनिया का एक भला कर दिया। अमरीका ने स्विस बैंकों पर दबाव डालकर अपने देश के 250 ऎसे धनाढ्य लोगों के गोपनीय खाते खुलवा लिए, जिन्होंने स्विट्जरलैंड के यू. बी. एस. बैंक में 3120 करोड रूपए अवैध रूप से जमा कर रखे थे। दुनिया के पांच देशों का नाम काला धन जमा करने वालों में सबसे ऊपर है। ये हैं भारत, रूस, ब्रिटेन, उक्रेन व चीन। आश्चर्य की बात ये है कि इस सूची में न सिर्फ भारत का नाम सबसे ऊपर है बल्कि भारत की स्विस बैंकों में अवैध रूप से कुल जमाराशि शेष दुनिया के देशों के कुल काले धन से भी ज्यादा है। एक आकलन के अनुसार भारत का 70 लाख करोड रूपया इन बैंकों में जमा है। अमरीका की तरह अगर यह धन भारत में वापस आ जाता है तो भारत के हर गरीब परिवार को 10 लाख रूपए मिलेंगे। यह धन आने से भारत की गरीबी मिट जाएगी और देश विदेशी ऋण से भी मुक्त हो जाएगा। इतनी बडी रकम का अवैध रूप से बाहर जाना यह सिद्ध करता है कि आजादी के बाद भारत के नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों, क्रिकेट और फिल्मी सितारों, ड्रग माफियाओं आदि ने देश को लूट-लूटकर ही अकूत दौलत विदेशों में जमा की है। दरअसल स्विस बैंकों का काम करने का तरीका इतना गोपनीय रहा है कि दाहिने हाथ को पता नहीं चलता कि बांया हाथ क्या कर रहा है इसलिए भारत के ये भ्रष्ट धनाढ्य अपना अवैध धन स्विस बैंकों में जमा करवाते रहे हैं। बैंक के मैनेजर और कर्मचारियों तक को नहीं पता होता कि किस खाते में किस व्यक्ति की रकम है। इस व्यवसाय के जानकार बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपनी अकूत दौलत स्विस बैंक में जमा करने जाता है तो वह बैंक के मैनेजर से संपर्क करता है। यदि मैनेजर को लगता है कि यह ग्राहक ठीक-ठाक है तो वह उसे बैंक के दो ऎसे अधिकारियों से मिलवा देता है जो उस व्यक्ति का खाता खुलवाने का काम करते हैं। ये दो या तीन व्यक्ति उन अधिकारियों में से होते हैं जिनकी विश्वसनीयता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। इन्हें नए खाताधारी का बैंकिंग सचिव कहा जाता है। सब कागजात पूरे हो जाने के बाद खाताधारी को स्विस बैंक का एकाउंट नम्बर दे देते हैं। किन्तु अपनी फाइल में असली खाता नंबर न डालकर एक कोड नाम डाल देते हैं। मसलन अगर खाता खोलने वाले का नाम राजकुमार लालवानी है तो उसके खाते का नंबर हो सकता है प्रिंस रेड 98, खाते का नंबर ग्राहक को बताने के बाद उसका कोड फिर बदल दिया जाता है और अब सम्बंधित बैंकिंग सचिव इस खाते से सम्बंधित फाइल को बंद करके एक ऎसे कक्ष में ले जाते हैं जहां काउंटर के ऊपर धुंधले कांच की दीवार बनी होती है। इस दीवार की तली में जो बारीक-सी झिरि होती है उसमें से होकर नए खातेदार की यह गोपनीय फाइल दूसरी तरफ सरका दी जाती है। दूसरी तरफ जो व्यक्ति उस फाइल को लेता है उसे यह नहीं पता होता कि यह फाइल किसकी है और शीशे के बाहर से फाइल देने वाले बैंकिंग सचिवों को यह नहीं पता होता कि शीशे की दीवार के पीछे इस फाइल को किसने लेकर लॉकर में रखा है। इस तरह नए खातेदार के खाते से सम्बंधित जो पांच-छह लोग होते हैं उनमें से किसी को भी पूरी जानकारी नहीं होती। मजे की बात तो यह है कि स्विस बैंक में धन जमा करने वालों को ब्याज मिलना तो दूर इसके उलट धन के संरक्षण के लिए उन्हें नियमित फीस देनी होती है। इस तरह स्विट्जरलैंड में अथाह धन जमा हो गया है। स्विट्जरलैंड के लोगों को अब इस बात का अहसास हुआ कि दुनिया भर में गरीबी, कुपोषण व भूख बढती जा रही है। दुनिया के तमाम देशों के भ्रष्ट नेता और नौकरशाह अपने भ्रष्ट आचरण के कारण जनता को दुख दे रहे हैं। जब दुनिया भर के अपराधी स्विट्जरलैंड में चोरी का धन छुपाएंगे तो स्विट्जरलैंड इस अनैतिकता के पाप का भागीदार बने बिना नहीं रह सकता। ऎसे विचारों ने स्वीट्जरलैंड के नागरिकों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया। इसके साथ ही दुनियाभर में स्विस बैंकों के खातों के प्रति जागरूकता और उनमें अवैध रूप से जमा अपने देश का धन वापस देश में लाने की मांग कई देशों में उठने लगी। इस सबका नतीजा यह हुआ कि स्विस नागरिकों ने अपने संविधान में संशोधन किया। चूंकि स्विट्जरलैंड दुनिया का सबसे परिपक्व लोकतंत्र है इसलिए वहां हर कानून बनने के पहले जनता का आम मतदान कराया जाता है। बहुमत मिलने पर ही कानून बन पाता है। इसलिए जब स्विस नागरिकों को नैतिक दायित्व का एहसास हुआ तो उन्होंने एक कानून बनाया जिसके अनुसार अब स्विस बैंकों में खोले गए खाते गोपनीय नहीं रहे। स्विट्जरलैंड की या अन्य किसी भी देश की सरकारें इन खातों की जानकारी प्राप्त कर सकती हंै। इसके लिए करना सिर्फ यह होगा कि संबंधित देश को उस व्यक्ति के खिलाफ, जिसके स्विस खाता होने का संदेह है, एक आपराधिक मामला दर्ज करना होगा। इसके बाद उस देश की सरकार स्विट्जरलैंड की सरकार को आधिकारिक पत्र लिखेगी जिसमें उस व्यक्ति के विरूद्ध दर्ज आपराधिक मामले का हवाला देते हुए स्विट्जरलैंड की सरकार से अनुरोध करेगी कि वह पता करके बताए कि उस व्यक्ति का कोई गोपनीय खाता स्विट्जरलैंड के बैंकों में तो नहीं है इस पत्र के प्राप्त हो जाने के बाद स्विट्जरलैंड की सरकार सभी बैंकों को इस पत्र की प्रतिलिपियां भेजेगी और उन बैंकों से यह जानकारी मांगेगी। अगर किसी बैंक में सम्बंधित व्यक्ति का गोपनीय खाता चल रहा होगा तो बैंक को उसकी पूरी जानकारी अपनी सरकार को देनी होगी। यह आश्चर्य की बात है कि ईमानदारी का ढिंढोरा पीटने वाले हमारे पिछले कई प्रधानमंत्रियों ने स्विस बैंकों से यह जानकारी मांगने की पहल नहीं की, जबकि अन्य कई देश ये पहल कर चुके हैं। भारत से लगभग 80 हजार लोग हर वर्ष स्विट्जरलैंड जाते हैं। इनमें 25 हजार लोग ऎसे हैं जो साल में कई बार दौरा करते हैं। ऎसे लोगों पर खुफिया जांच करके इनके चाल-चलन से इनके बैंकों तक पहुंचा जा सकता है। ओबामा की पहल से पे्ररित होकर इस चुनाव के पहले भारत में स्विस बैंकों से काला धन वापस लाने के लिए एक माहौल बनाया जा रहा है, जो शुभ लक्षण है। पर यह माहौल वे लोग बना रहे हैं जिनका लक्ष्य काला धन वापस लाना नहीं बल्कि प्रधानमंत्री पर हमला बोलना है। ये सिद्ध करना चाहते हैं कि व्यक्तिगत जीवन में ईमानदार रहने वाले प्रधानमंत्री इतने बडे मुद्दे पर बेईमानों को संरक्षण दे रहे हैं। इससे ज्यादा गम्भीरता इस अभियान की नहीं है।

Saturday, February 21, 2009

"कठघरे" में न्याय 
 

इ स देश का दुर्भाग्य कहना चाहिए कि जनप्रतिनिधि से लेकर नौकरशाह तक आपराधिक मामलों में फंसे हैं। वे नहीं चाहते कि अदालतें मामलों का निपटारा समय पर करें, क्योंकि इससे उनकी खुद की गर्दन फंस जाएगी। जितनी देरी होगी उतने में वे गवाह को तोडने, जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे हथकण्डे अपनाकर खुद के बच निकलने का रास्ता निकाल लेते हैं। लेकिन कई सालोें से इस सवाल को उलझा कर रखने वाले अब थोडा दबाव महसूस करने लगे हैं। आम लोगों की आवाज अनसुनी करने का मतलब उन्हें समझ में आने लगा है, ऊपर से जनता के साथ विकास में भागीदार बन रहे विदेशी निवेशक और औद्योगिक घरानों का स्वर भी मिल गया है, ऎसे में व्यवस्थागत बदलाव की तरफ थोडा सोच बनती दिख रही है। 

के. टी. एस. तुलसी 
पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल
भारतीय संविधान को इतना पैना बनाया गया है कि उसमें बेगुनाह फंसने से बचाने और गुनहगार के किसी भी तरह से नहीं बच पाने के पूरे प्रावधान रखे गए हैं। भारतीय संविधान में सबको समय पर न्याय की अवधारणा के तहत ही मामले के निपटारे की मियाद सुनिश्चित की गई थी, परन्तु इतने अच्छे प्रावधान, सख्त कानून के बाद भी भारत में अपराधों की संख्या में इतना इजाफा हो गया कि समूची न्याय व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे। देश में इस मसले पर खूब बहस चली। बुद्धिजीवी हों या सामान्य जन कई मंचों से यह सवाल उठे। जनाक्रोश बढता देख सरकारों ने संविधान में बदलाव करके कानून और कडा करने का संदेश देकर जनता को यह संदेश दिया कि उनकी चिंताओं से सरकार भी चिंतित है।

नेता डरते हैं, सुधार करने से 
ऎसा नहीं है कि देश को चलाने वालों को इसका उपाय पता नहीं है। उन्हें तकनीक मालूम है जिससे अपराधियों के मन में भय पैदा किया जा सके, लेकिन उस पर अमल इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि इससे खुद राजनीतिज्ञ और नौकरशाहों के मन में डर भरा हुआ है। कई सालोें से इस सवाल को उलझा कर रखने वाले अब दबाव महसूस करने लगे हैं। आम लोगों की आवाज अनसुनी करने का मतलब उन्हें समझ में आने लगा है, ऊपर से जनता के साथ विकास में भागीदार बन रहे विदेशी निवेशक और औद्योगिक घरानों का स्वर भी मिल गया है, ऎसे में व्यवस्थागत बदलाव की तरफ थोडा सोच बनती दिख रही है। 

अपराधियों को लाभ
भारत में वर्गीकृत दण्ड का प्रावधान इसी मकसद से किया गया था कि अपराधियों के मन में कानून के प्रति डर बना रहे और वह अपराध करने से पहले सख्त सजा से घबराकर अपने कदम खींच ले। आजादी के बाद कुछ साल तक ऎसा हुआ, परन्तु समय के साथ न्यायिक जांच प्रक्रिया इतनी जटिल होती गई कि तीन से छह माह में निपटारा हो जाने वाले मामलों में पांच से दस साल लगने लगे। इसका दुष्परिणाम ये रहा कि पेचीदा जांच, लम्बी बहस और रोज कोर्ट से बुलावा के कारण गवाह तंग होने लगा या टूटने लगा। इसका फायदा अपराधियों को मिला।

पद्धति बदलें, समस्या हल
इस देश में कानून बदलने की बजाय यदि अदालतों की सौ साल पुरानी पद्धति को बदल दिया जाए तो बहुत सारी दिक्कत अपने आप हल हो जाएगी। कम कर्मचारियों वाले अदालत में मुकदमोें का भण्डार लगा है। किसी को यह देखने की फुर्सत नहीं है कि अदालतें किस आभाव में काम कर रही हैं। उनके पास जरूरी साजोसमान है अथवा नहीं। ऎसे में समयबद्ध मामले के निपटारे की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आज अदालतों का आधुनिकीकरण सबसे बडी जरूरत है। पुरानी परम्परा को त्यागकर हमें अदालतों को ऎसे आधुनिक साजोसमान उपलब्ध कराने होंगे जिससे धीमी गति को रफ्तार दी जा सके। 

तकनीक का करें इस्तेमाल
सभी अदालतों के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत है। अदालतों में आडियो विजुअल रिर्काडिंग सिस्टम लगाया जाना चाहिए। जिससे गवाही, बहस सहित सभी जरूरी बातों को लिखने में जाया होने वाले समय को बचाया जा सके। सभी अदालतों में कम्प्यूटर, शार्ट हैण्ड मशीन जैसे बेहतर उपकरण होने से बहुत समय बचाया जा सकता है। लेकिन इस तरफ कभी ध्यान नहीं दिया गया। इस देश का दुर्भाग्य कहना चाहिए कि जनप्रतिनिधि से लेकर नौकरशाह तक ऎसे मामलों में फंसे हुए हैं कि वे खुद नहीं चाहते कि अदालतें मामलों का निपटारा समय पर करें, क्योंकि उससे उनकी खुद की गर्दन फंस जाएगी। जितनी देरी होगी उतने में गवाह को तोडने, जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे हथकण्डे अपनाकर खुद के बच निकलने का रास्ता निकाल लेते हैं। ऎसे में कानून पर अंगुली उठानेे की बजाय हमें वास्तविकता समझनी होगी। सरकारों की यह वास्तविकता अब उजागर होने लगी है।

वास्तविकता समझनी होगी
पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि सरकार जागी है। इस हलचल का कारण विदेशी निवेशकों, औद्योगिक घरानों के दबाव को माना जा रहा है। परन्तु अभी सरकार पर उस तरीके का दबाव नहीं पड रहा कि वह जल्दी हरकत में आए। हालांकि भारतीय न्याय प्रणाली को पटरी में लाने में वक्त लगेगा, लेकिन जिसमें सुधार की सम्भावना नहीं दिख रही थी, उसमें यह पहल उम्मीद जगाती है। 
-जैसा उन्होंने राकेश शुक्ला को बताया

जरूरत है भ्रष्टाचार से लडने की 
1946 से वकालत के साथ ही राजनीति से भी जुड गया था। स्वतंत्रता के करीब तीन साल बाद देश में गणतंत्र की स्थापना के बाद पहला समारोह नागौर के मानासर चौराहे के पास हुआ। तब हम लोग इस समारोह में उत्साह से शामिल हुए। हर जगह गणतंत्र की बदौलत नागरिकों को हासिल हुए अधिकारों की गंूज थी। सभी को गर्व था कि हमारा संविधान बन गया है, जो हमारे अधिकारों की रक्षा करेगा। करीब सात साल बाद तब और खुशी हुई जब 2 अक्टूबर 1959 को प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागौर से ही पंचायतीराज की नींव रखी। इसका नतीजा था कि 1959 में पंचायती राज संस्थाओं के हुए चुनाव में मुझे मूण्डवा से निर्विरोध प्रधान चुना गया। इसके 15-20 दिन बाद मुझे नागौर का प्रथम जिला प्रमुख बनने का गौरव हासिल हुआ। तब हमारी सोच थी कि गांवों में विकास के साथ ही ग्रामीणों को शिक्षित कर राष्ट्र के विकास में भागीदार बनाया जाए। तरक्की तो आज भी हो रही है, लेकिन इसमें स्वार्थ और भ्रष्टाचार ज्यादा है। मुझे याद है सभी सदस्यों ने तय किया कि जिला परिषद का भवन बनवाया जाए। इसके लिए हमने तत्कालीन प्रशासन से मशविरा किया तो निर्णय हुआ कि पंचायतों को सीमित फण्ड मिलता है, इसलिए आपसी सहयोग से जिला परिषद का भवन बनवाया जाए। हमने किया भी यही। उस समय के राजनेता अच्छे थे और अच्छे लोगों को राजनीति में लाने की पहल करते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद नागौर आए मोहनलाल सुखाडिया ने कहा था कि अच्छे लोगों को हमेशा सहयोग करो, वे आपके काम को याद रखेंगे। आज ऎसा नहीं है। लोगों की नजर में स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस औपचारिकता बनकर रह गए हैं। इसी कारण मैंने 1975 में राजनीति को अलविदा कर दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू का सपना था कि पंचायत राज व्यवस्था के जरिए गांव और उनमें रहने वाले पिछडे लोगों का विकास हो और गणतंत्र मजबूत हो, लेकिन यह सपना पूर्ण रूप से साकार नहीं हो पाया। 70 के दशक के बाद भ्रष्टाचार की फैलती जडों ने इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला करना शुरू कर दिया। यह भ्रष्टाचार बाद के सालों में बढता ही गया। आज युवाओं को इस भ्रष्टाचार से लडने की जरूरत है। बदमाशी करने वाले लोगों को दण्डित किया जाए और गरीब का सम्मान हो, तभी पूरा होगा गणतंत्र का मकसद। 
-जैसा लिखमाराम चौधरी ने 
इंशाद खान को बताया

माया की "माया"
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का मामला पांच साल से लम्बित है। सीबीआई ने वष्ाü 2003 में यह मामला दर्ज किया था। अब सीबीआई ने कोर्ट को बताया है कि अकबरपुर से लोकसभा चुनाव लडते समय उन्होंने एक करोड रूपए की सम्पत्ति बताई थी जो वर्ष 2007 में बढ कर पचास करोड हो गई है। मायावती के मुताबिक कार्यकर्ताओं से जन्मदिन पर मिले चन्दे की राशि से उनका धन बढा है। 

मुलायम भी कम नहीं
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह पर भी आय से अधिक सम्पत्ति का मामला लम्बित है। इस मामले में सीबीआई इसी महीने अपने ढुलमुल रवैये को लेकर उ“ातम न्यायालय से फटकार खा चुकी है। मार्च-07 में एक जनहित याचिका पर न्यायालय के आदेश से मुलायम, उनके पुत्रों व पुत्रवधू के खिलाफ जांच शुरू हुई थी। सीबीआई ने दो सप्ताह पहले हुई सुनवाई के दौरान अदालत से रिपोर्ट पेश करने के लिए फिर समय मांग लिया। 

जो अटके सो लटके
देश की अदालतों में ऎसे मामलों की लम्बी फेहरिस्त है जो एक बार अटके तो दस, पन्द्रह, बीस साल से लटके हुए हंै। हर्षद मेहता काण्ड, बाबरी मस्जिद काण्ड, 84 के दंगों का मामला और ऎसे ही न जाने कितने बडे और चर्चित मामले तो आम लोगों को याद तक हो चुके हैं। चन्दमिसालें यहां फिर याद दिला देते हैं...

84 के दंगे
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या के बाद देशभर में फैले सिख विरोधी दंगों के पीडितों को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। अनेक आयोग बने लेकिन प्रमुख कर्ताकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई। पूर्व मंत्री जगदीश टाइटलर के खिलाफ एक याचिका अब भी दिल्ली की अदालत में चल रही है। सीबीआई ने इसी महीने अदालत में आवेदन दायर कर अंतिम स्टेटस रिपोर्ट दायर करने के लिए तीस दिन का समय मांगा है। उडीसा ने हाल ही में उस समय के पीडितों के लिए मुआवजा राशि जारी की है।

बाबरी ढांचा विध्वंस
वर्ष 1992 में अयोध्या में बाबरी ढांचे को तोडने को लेकर राम जन्मभूमि पुलिस चौकी पर दर्ज मामले की सुनवाई अब तक गति नहीं पकड पाई है। राज्य पुलिस से मामला सीबीआई के पास पहुंचा और सीबीआई ने वष्ाü1993 में आरोप पत्र दायर किया लेकिन आरोप तय हो पाए बारह साल बाद। उ“ातम न्यायालय ने वर्ष 2005 में यह मामला रायबरेली हस्तांतरित किया था। चौकी पर एफआईआर दर्ज करने वाले एएसआई हनुमान प्रसाद और तब वहां तैनात सीआरपीएफ के डिप्टी कमाण्डेन्ट आर. के. स्वामी के ही बयान हो पाए हैं।

भागलपुर दंगे
बिहार के भागलपुर और आस-पास के इलाके में 1989 में दंगे भडक उठे थे। आधिकारिक आंकडों के अनुसार दंगों में कुल 1070 लोग मारे गए। उ“ा न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रामचन्द्र प्रसाद सिन्हा और शमसुल हसन के जांच आयोग ने पुलिस एवं प्रशासन के 14 अधिकारियों को दोषी बताया लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। दंगों को लेकर 142 एफआईआर दर्ज हुई जिनमें से कुछ में दो साल पहले तक सुनवाई चलती रही। कुछ अभियुक्तों को सजा हो पाई है। केन्द्र ने जून 2008 में मुआवजा स्वीकृत किया। 

चारा घोटाला
बिहार में पन्द्रह साल पहले यह घोटाला उजागर हुआ जिसमें चारे के नाम पर 950 करोड रूपए की हेरफेर की गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव पर भी आरोप लगे। उ“ातम न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने जांच के बाद यादव सहित अनेक राजनेताओं को मामले में लिप्त बताया। बाद में लालू यादव को इस्तीफा देना पडा। इस घोटाले को लेकर दर्जनों एफआईआर दर्ज हुए जिनमें से कुछ की सुनवाई पूरी होकर कुछ अभियुक्तों को सजा हो गई है लेकिन अनेक मामले अब भी अदालतों में लम्बित हैं।

हर्षद मेहता घोटाला
वर्ष 1991-92 में शेयर मार्केट में हुए इस बडे घोटाले ने हजारों लोगों को बर्बाद कर दिया। शेयर मार्केट का यह पहला बडा घोटाला था। दस हजार करोड रूपए के इस सिक्योरिटी घोटाले में मेहता के साथ अनेक बैंकों के अधिकारी शामिल थे। उस समय लिस्टेड कम्पनियों में से एक हजार से ऊपर का तो नामोनिशान तक नहीं बचा है। मुम्बई में वर्ष 1992 में इस मामले को लेकर स्थापित हुई विशेष अदालत 16 साल गुजरने के बाद भी सुनवाई कर रही है। हालांकि हर्षद मेहता की मौत हो चुकी है। 
"कल्याण" हो तो कैसे 
 

लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति के मन में प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पैदा हो सकती है। फिर 70 वर्ष से राजनीति में सक्रिय आडवाणी की ये महत्वाकांक्षा गलत नहीं है। पर उन्हें आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि क्या कारण है कि नए-नए लोगों के जुडने के बजाय एक-एक करके सब पुराने बडे नेता और उनके सहयोगी उनसे कन्नी काट चुके हैं। अब उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है। 

कल्याण सिंह फिर रूठ गए। इससे पहले भैरोंसिंह शेखावत प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर चुके हैं। नरेन्द्र मोदी ने उद्योग जगत से खुद को भावी प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित करवा दिया। जिन्ना वाले बयान पर आडवाणी के खिलाफ संघ, विहिप और भाजपा का नेतृत्व पहले ही काफी आग उगल चुका है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी गाहे-बगाहे खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताते रहते हैं। फिर अपना बयान वापस भी ले लेते हैं। उमा भारती और गोविन्दाचार्य जैसे आडवाणी के खासुलखास रहे सिपहसालार कब से उनसे खफा हैं। अटल बिहारी और आडवाणी के सम्बन्धो के बारे में भी विरोधाभासी बयान आते रहते हैं। जिन दिनों गोविन्दाचार्य आडवाणी के निकट थे, उन दिनों उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का मुखौटा बताकर बहुत बडा विवाद खडा कर दिया था। पर इससे ये संकेत तो साफ हो गया कि आडवाणी की टीम अटल बिहारी को दल का असली नेता नहीं मानती। अब इसमें गलती किसकी मानी जाए
इन सब लोगो की या आडवाणी की कैसी गलती क्या वो इसलिए गलत हैं कि वे अपने मन में प्रधानमंत्री बनने की लालसा पाले हुए हैं या फिर इसलिए कि उनके नेतृत्व में उनके ही सहयोगियों का विश्वास नहीं। 

दरअसल आडवाणी के व्यक्तित्व को लेकर भाजपा में ऊपर से नीचे तक काफी द्वंद्व है। मीडिया का सहारा लेकर और सोची समझी रणनीति के तहत रामरथयात्रा के दौरान उनकी जो आक्रामक छवि प्रस्तुत की गई थी उसने उन्हें कार्यकर्ताओं का हीरो बना दिया था। सबको लगता था कि अगर राम राज्य आएगा तो आडवाणी के नेतृत्व में ही आएगा। राम राज्य तो नहीं आया अलबत्ता एन. डी. ए. राज जरूर आया और इस राज में आडवाणी उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री थे। दोनों ही पद काफी ताकतवर थे पर वे ऎसा कुछ भी नहीं कर पाए जिससे उनके दूसरा लौह पुरूष होने का प्रमाण मिलता। इससे उनके चाहने वालों को काफी निराशा हुई। फिर रामजन्म भूमि से लेकर जिन्ना प्रकरण तक जिस तरह आडवाणी के विरोधाभासी बयान आते रहे, उससे उनके प्रति रहा बचा मोह भी भंग होता गया। आज हालत ये है कि भाजपा के पास कोई राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं है। संगठन में वो अनुशासन नहीं बचा जिसकी दुहाई नब्बे के दशक में दी जाती थी। मजबूरी में उनके घोर विरोधियों को भी आडवाणी को एन.डी.ए. की सम्भावित सरकार का नेता मानना पड रहा है। पर ये सब मानते हैं कि मौजूदा हालातों में आडवाणी का वो करिश्मा नहीं बचा जो उन्हें चुनाव की वैतरणी पार करा सके। इसलिए सबके मन मे बेचैनी है।

उधर अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने के लिए आडवाणी ने जिन्ना प्रकरण को जानबूझकर खडा किया। जिससे उन्हें सहयोगी दलों का समर्थन मिल सके। वैसे भी उनका वह बयान उनकी अपनी सोच का परिचायक था। दुनिया में बनी छवि के विपरीत आडवाणी धर्मान्ध व्यक्ति नहीं हैं। आडवाणी जानते हैं कि इस देश में धर्मान्ध राजनीति करने वाले शीर्ष तक नहीं पहुंचते। इसलिए वे जानबूझकर ऎसे विवादों को पनपने देते हैं, जिनसे उनकी रामजन्म भूमि आन्दोलन वाली छवि समाप्त हो जाए। अलबत्ता वे संघ को भी खुश रखना चाहते हैं ताकि उनका कार्यकर्ता उनसे जुडा रहे और चुनाव में काम आता रहे। आडवाणी ही क्यों, नरेन्द्र मोदी तक बदल चुके हैं। अमरीका वाले लाख गोधरा के मोदी को याद कर गाली देते रहें। मोदी अब खुद धर्म निरपेक्ष छवि बनाने में लगे हैं। पिछले दिनों गुजरात में विहिप के कार्यकर्ताओं पर उनके राज्यकाल में जो लाठियां चलीं, उससे संघ परिवार बहुत नाराज हुआ। पर मोदी ने भी यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया। 

जहां तक नेतृत्व का सवाल है, इसमें शक नहीं कि आडवाणी अपने साथियों का प्रेम और विश्वास जीतने में विफल रहे हैं। वरना क्या वजह है शारीरिक रूप से चलने-फिरने में असमर्थ हो चुके अटल बिहारी को उनके सहयोगी बेहिचक अपना नेता मानने को आज भी तैयार हैं। पर आडवाणी को वे मन से अपना नेता नहीं मानते। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति के मन में प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा पैदा हो सकती है। फिर 70 वर्ष से राजनीति में सक्रिय आडवाणी की ये महत्वाकांक्षा गलत नहीं है। पर उन्हें आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि क्या कारण है कि नए-नए लोगों के जुडने के बजाय एक-एक करके सब पुराने बडे नेता और उनके सहयोगी उनसे कन्नी काट चुके हैं। अब उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है। इस बार प्रधानमंत्री नहीं बने तो फिर पांच साल बाद तो और भी देर हो जाएगी। इसलिए उनके हक में यही होगा कि वे लोगों को टूटने न दें बल्कि जो अलग हो गए हैं, उन्हें भी फिर से जोड लें। कल्याण सिंह का अलग होना यह बताता है कि चुनाव तक भाजपा और भी बडे झटके झेल सकती है। इसलिए आडवाणी को अब भी कोशिश करनी चाहिए कि उनके व्यक्तित्व में ऎसा निखार आए कि लोग उनसे बचें नहीं, टूटें नहीं बल्कि उनके साथ जुडकर दल का एजेण्डा आगे बढाएं। अगर वे ऎसा नहीं कर पाते हैं तो उनकी आगे की राह आसान नहीं होगी। फिर भाजपा का भी कोई ज्यादा कल्याण होने वाला नहीं है। 
ivan Ka Fanda :-
Zindagi hai choti, har pal mein khush raho... 

Office me khush raho, ghar mein khush raho... 
Aaj paneer nahi hai, dal mein hi khush raho... 
Aaj gym Jane ka samay nahi, do kadam chal ke hi khush raho... 
Aaj Dosto ka sath nahi, TV dekh ke hi khush raho...

Ghar ja nahi sakte to phone kar ke hi khush raho... 
Aaj koi naraaz hai, uske iss andaz mein bhi khush raho... 

Jise dekh nahi sakte uski awaz mein hi khush raho...
Jise paa nahi sakte uski yaad mein hi khush raho 

Laptop na mila to kya, Desktop mein hi khush raho...
Bita hua kal ja chuka hai, usse meethi yaadein hai, unme hi khush raho... 

Aane wale pal ka pata nahi... Sapno mein hi khush raho...
Haste haste ye pal bitaenge, aaj mein hi khush raho

Zindagi hai choti, har pal mein khush raho