Sunday, March 6, 2011

सात साल बाद मिलेंगे 15 नए राष्ट्रीय राजमार्ग

लाडनूं को मिलेगा एक और हाई-वे
जयपुर। प्रदेश को करीब सात वर्ष बाद नए राष्ट्रीय राजमार्ग मिलने की उम्मीद बंधी है। राज्य सरकार ने पिछले दिनों 3515 किमी के 15 संशोघित प्रस्ताव केन्द्र को भेजे हैं। उम्मीद है कि इनमें से करीब 1500 किमी सड़कों को कुछ दिनों में राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित कर दिया जाएगा। सूत्रों के अनुसार नए राष्ट्रीय राजमार्गो के लिए केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी ने राज्य सरकार को कुछ सुझाव दिए थे।
जोशी चाहते थे कि आदिवासी, दूरदराज, रेगिस्तानी, माइनिंग, सीमेंट उत्पादन, नए पर्यटन क्षेत्रों को विशेष रूप से जोडऩे वाले प्रस्ताव भेजे जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक निर्माण विभाग ने संशोघित प्रस्ताव बनाए। ये प्रस्ताव जल्द केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के समूह के समक्ष रखे जाएंगे। इससे पहले सार्वजनिक निर्माण विभाग ने 2009 में करीब 2200 किमी सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने के प्रस्ताव भिजवाए थे। 2004 के बाद प्रदेश में एक भी नया राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित नहीं हुआ है।
लाडनूं को एक और हाई-वे
लाडनूं से राष्ट्रीय राजमार्ग सं. 65 पहले से ही गुजर रहा है। किशनगढ से हनुमानगढ मेगा हाई-वे भी लाडनूं होकर गुजर रहा है और अब लाडनूं होकर पाली जिले के भीम तक 253 किलोमीटर लम्बा राजमार्ग फिर राज्य सरकार ने प्रस्तावित किया है। लाडनूं से खाटू-डेगाना-मेड़ता सिटी-लाम्बिया-जैतारण-रायपुर होकर भीम जाने वाले इस मार्ग के निकलने से इस क्षेत्र को विकास के नए आयाम मिलेंगे। इसी प्रकार इस क्षेत्र के प्रसिद्ध सालासर धाम के नेछवा, सीकर, नीम का थाना होते हुए कोटपूतली, अलवर व भरतपुर से जुड़ जाने से भी काफी सुविधाएं मिल सकेंगी। इधर नागौर को भी जयपुर उसे वाया कुचामन होते हुए सीधा फलौदी से जोड़ा जा रहा है।
इनका कहना है
मैं और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नए राष्ट्रीय राजमार्गो के लिए केंद्रीय मंत्री सी.पी.जोशी से मिले थे। इसके बाद नए प्रस्ताव भिजवाए हैं।
-प्रमोद जैन भाया,
सार्वजनिक निर्माण राज्यमंत्री
इस बार भेजे गए इन सड़कों के प्रस्ताव
1. बूंदी-बिजोलिया-लाडपुरा-भीलवाड़ा-गंगापुर-राजसमन्द
- 210 किमी
2. उनियारा-नैनवा-हिण्डौली-जहाजपुर-शाहपुरा-गुलाबपुरा
- 213 किमी
3. पाली-देसूरी-गोमती चौराहा-वाया नाडोल -93 किमी
4. उदयपुर-झाड़ोल-सोम-नालवा-दाईया-इदर
-108 किमी
5. लाम्बिया-रास-ब्यावर-बदनोर-आसींद-माण्डल -148 किमी
6. मथुरा-भरतपुर-बयाना-भाड़ोती-सवाई माधोपुर-इटावा-मांगरोल-बारां - 304 किमी
7. मावली-भांसोल-ओडन-खमनोर-हल्दीघाटी-कुंभलगढ़-चारभुजा -130 किमी
8. रतलाम-बांसवाड़ा-सागवाड़ा-डूंगरपुर-खेरवाड़ा-कोटड़ा-स्वरूपगंज - 310 किमी
9. जयपुर-जोबनेर-कुचामन-नागौर-फलौदी -366 किमी
10. लाडनूं-खाटू-डेगाना-मेड़ता सिटी-लाम्बिया-जैतारण-रायपुर-भीम - 253 किमी
11. मन्दसौर-प्रतापगढ़-धरियावाद-सलूम्बर-डूंगरपुर-बिच्छीवाड़ा -164 किमी
12. श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़-नोहर-भादरा-राजगढ़-झुंझुनू-उदयपुरवाटी-अजीतगढ़-शाहपुरा
- 474 किमी
13. रेवाड़ी- नारनौल-पचेरी-चिड़ावा-झुंझुनू-फतेहपुर
-123 किमी
14. भरतपुर-डीग-अलवर-बानसूर-कोटपूतली-नीम का थाना-सीकर-नेछवा-सालासर
- 301 किमी
15. कोसी-कामां-डीग-भरतपुर-रूपवास-धौलपुर -133 किमी
16. स्वरूपगंज-सिरोही-जालोर-सिवाणा-बालोतरा - 215 किमी

लाडनू बना तेरापंथ की raajdhaanee

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लाडनूं तेरापंथ की राजधानी घोषित

आचार्य महाश्रमण के तीन दिवसीय प्रवास ने बदली लाडनूं की फिजां

लाडनूं (कलम कला न्यूज)। तेरापंथ धर्मसंघ के 11 वें आचार्य महाश्रमण ने लाडनूं को तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी के रूप में घोषित किया है। इससे पूर्व नौंवें आचार्य गुरूदेव तुलसी ने लाडनूं को तेरापंथ का केन्द्र बनाने का भरसक प्रयास किया था, लेकिन वे इसे राजधानी के रूप में इतना खुला घोषित नहीं कर पाए थे। लाडनूं आचार्य तुलसी का जन्म-स्थान है और आचार्य तुलसी के जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर लाडनूं को तेरापंथ का गढ घोषित किए जाने से लोगों को अपार हर्ष का अनुभव हुआ है। आचाय्र महाश्रमण के साथ युवाचार्य के रूप में महाश्रमण यहां से गए थे और उनके देवलोकगमन के बाद आचार्य के रूप में पदारोहण के पश्चात् पहली बार आचार्य महाश्रमण लाडनूं पधारे। लाडनूं वासियों ने पलक पांवड़े बिछाकर उनका स्वागत किया और उनके अल्पकाल के प्रवास का अधिकतम फायदा उठाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों की संरचना इस मौके पर की। जैनविश्वभारती का उन्होंने स्वयं घूमकर एकबार पूरा अवलोकन किया, वहां की एक-एक गतिविधि की जानकारी हासिल की। वे जैनविश्वभारती और उससे सम्बद्ध विश्वविद्यालय से काफी अभिभूत हुए। उन्हें आचार्य तुलसी की परिकल्पना में बहुत दम लगा। वे तुलसी के स्मारक पर भी गए। उन्हें लगा कि यह लाडनूं ही वह स्थान है, जहां तेरापंथ अपना विश्व स्तरीय स्वरूप धारण कर सकता है। उन्होंने अपने अभिनन्दन समारोह में कहा, अब तक सरदारशहर को तेरापंथ की राजधानी माना जाता रहा है, अब लाडनूं नगर राजधानी होगा, इसकी घोषणा करता हूं। लाडनूं के साथ तेरापंथ का बहुत बड़ा इतिहास रहा है। इसके अलावा जैन विश्व भारती, विश्वविद्यालय, विशाल ग्रन्थागार, धर्मोपकरण भंडार, वृद्ध साध्वर सेवा केंद्र, पारमाथिग्क शिक्षण संस्थान, समण श्रेणी यहां मौजूद है।

आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय के तीन खण्डों का लोकार्पण

जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में नवनिर्मित्त आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय भवन, आचार्य तुलसी महिला शिक्षा केन्द्र भवन व आचार्य महाप्रज्ञ केन्द्रीय शैक्षणिक भवन का लोकार्पण करने के पश्चात्ï आयोजित समारोह में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि ज्ञान की आराधना होनी चाहिए, ज्ञान को सर्वोपरि तत्व माना गया है। उन्होंने जैन संस्थाओं से जैन विद्या के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जैन विश्व भारती एवं उससे सम्बद्घ विश्वविद्यालय का तो कत्र्तव्य है कि वह जैन विद्या पर आवश्यक ध्यान दें। उन्होंने सभी तेरापंथ संस्थाओं को परस्पर मनोमालिन्य दूर कर मिलकर काम करने की आवश्यकता बताई तथा कहा कि तभी समाज एवं अन्य लोगों का भला हो सकता है। उन्होंने जैन विश्व भारती को कामधेनु की उपमा देते हुए कहा कि जब तक इसका दोहन नहीं हो, समाज लाभान्वित नहीं हो सकता। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा द्वारा बनाए गए आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय के मुख्य भवन एवं उनसे सम्बन्धित आचार्य तुलसी महिला शिक्षा केन्द्र व आचार्य महाप्रज्ञ केन्द्रीय शैक्षणिक भवन का उद्ïघाटन आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में क्रमश: राजेन्द्र बच्छावत, श्रीमती कुमुद नवरत्नमल बच्छावत व श्रीमती मंगलीदेवी दुधेडिय़ा ने किया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष चैनरूप चिण्डालिया नें बताया कि महासभा अपने संगठन के दायित्व को पूरा करने के साथ शिक्षा के आयाम के प्रति भी सदैव सजग रही है। आचार्य तुलसी के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय के तीन खण्डों के भवन निर्माण का दायित्व भी निर्धारित दस महीनों के समय में महासभा ने पूर्ण किया है। उन्होंने अपने सम्बोधन में इन भवनों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

मुनि महेन्द्रकुमार ने कहा कि आज शिक्षा विभिन्न आयामों में फैलती जा रही है लेकिन उसका मूल केन्द्र गायब है। आंतरिक चेतना और मानवीय मूल्यों के बिना शिक्षा कभी पूर्ण नहीं हो सकती। हमें आंतरिक चेतना का रूपान्तरण करना होगा । उन्होंने जैन विद्वानों को तैयार करने की योजना पर भी प्रकाश डालते हुए जैन दर्शन, जैन साधना व समग्र जैन संस्कृति के उद्घार के लिए आवश्यक बताया। आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या डा. समणी मल्लिप्रज्ञा ने समाज में महिला विकास और महिला शिक्षा की आवश्यकता बताते हुए इस क्षेत्र में तेरापंथ धर्मसंघ की विशेष भूमिका की जानकारी दी।

जैन विश्व भारती के अध्यक्ष सुरेन्द्र चौरडिय़ा ने आचार्य महाप्रज्ञ के करीब साढ़े चार साल पूर्व प्राप्त संदेश का वाचन करते हुए जैन विश्व भारती को आचार्य तुलसी के सपने की कामधेनु बताया व जैन विश्व भारती को विश्वविद्यालय की पितृ संस्था बताया और कहा कि दोनों निरन्तर मिलकर काम कर रहे हैं।

जैन विश्व भारती की कुलपति समणी चारित्रप्रज्ञा ने इस अवसर पर कहा कि आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ कभी सम्प्रदाय में बंधकर नहीं रहे। उनका चिंतन समूचे मानव समुदाय के लिए था। उसी के अनुरूप हम समाज में एक बड़े परिवर्तन का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। आचार्य कालू कन्या महाविद्यालय की पूर्व प्राचार्या साध्वी ऋतुयशा ने भी संस्था के निरन्तर विकास और विभिन्न बहुआयामी कोर्स शुरू करने की आवश्यकता बताई।

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Saturday, March 5, 2011

शिक्षकों ने मांगा 19 माह का बकाया वेतन

शिक्षकों ने मांगा 19 माह का बकाया वेतन
लाडनूं। स्थानीय निजी शिक्षण संस्था के.बी. प्राथमिक विद्यालय के शिक्षाकर्मियों को करीब 19 महीनों का बकाया वेतन भुगतान नहीं किए जाने को लेकर विद्यालय के कार्मिकों ने एक सामूहिक पत्र जिला कलक्टर एस.एस.बिस्सा को जनसुनवाई चौपाल के दौरान सौंपा।
विद्यालय के कर्मचारियों प्रकाशचंद वर्मा, कमलेशकुमार गुप्ता, जवानसिंह व दीनदयाल शर्मा द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में बताया गया है कि राजकीय अनुदान प्राप्त इस शिक्षण संस्था के कर्मचारियों को जून, 2006 से मार्च, 2007 तक तथा अप्रैल, 2010 से दिसम्बर 2010 तक का वेतन भुगतान नहीं किए जाने से उन पर आर्थिक संकट गिर चुका है। परिवार के सदस्यों का पालन-पोषण तक ढ़ंग से नहीं हो पा रहा है तथा उनके भूखों मरने की नौबत तक आ चुकी।
उन्होंने बकाया 19 माह का वेतन अविलम्ब भुगतान करवाने की मांग की है। जिला कलक्टर ने इस सम्बन्ध में जिला शिक्षा अधिकारी को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

करोड़ों का क्रिकेट सट्टा पकड़ा

करोड़ों का क्रिकेट सट्टा पकड़ा
एस.पी. के निर्देश पर कार्रवाई
लाडनूं। वल्र्ड कप किक्रेट मैचों को लेकर होने वाली करोड़ों की सौदेबाजी पर नियंत्रण के लिए पुलिस अधीक्षक डा.बीएल मीणा के निर्देश पर पुलिस ने छापा मारकर चार जनों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उनके कब्जे से एक लाख 71 हजार 6 00 रूपए नकद, 45 मोबाइल, एक टीवी, कम्प्यूटर, लेपटॉप, टेपरिकॉर्डर, पांच कैसेट व लेनदेन के हिसाब की डायरी व रिकार्डिंग मशीन बरामद की है।
पुलिस उपअधीक्षक गोपाल रामावत ने बताया कि 27 फरवरी रविवार को शहर के विभिन्न क्षेत्रों में क्रिकेट मैचों को लेकर सौदे होने की जानकारी मिलने पर चार दलों का गठन किया गया। पुलिस ने विभिन्न स्थानों पर एक साथ छापामार कार्रवाई की। शहर के दूसरी पट्टी स्थित एक मकान पर छापे में लाडनूं निवासी सौरभ बैद पुत्र रमेशकुमार बैद, भागचंद पुत्र गैंदाराम विश्नोई निवासी नोखा, विशु पुत्र बनवाली बंगाली निवासी गोहाटी व शिव पुत्र सियाराम दर्जी निवासी नोखा को सौदा करते रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। सभी आरोपियों को हिरासत में लेकर उपकरण जब्त कर लिए।
कार्रवाई करने वाली टीम का नेतृत्व जसवंतगढ़ थानाप्रभारी अमराराम विश्नोई ने किया। टीम में अयूब खां, अब्दुल शकील, ओमप्रकाश शर्मा, नवरत्नमल, संजयकुमारी, संजू व हरिराम आदि पुलिसकर्मी शामिल थे। पुलिस की सट्टे के खिलाफ कार्रवाई से शहर में हडकंप मच गया। अनेक सटोरियों को सौदा होने से पहले ही अपने स्थान बदलने पड़ गए। पुलिस ने बताया कि अभियान जारी रहेगा। इस कार्यवाही के दिन स्थानीय थानाधिकारी अवकाश पर बाहर गए हुए थे। बताया जाता है कि कुछ पुलिसकर्मियों की मिलीभगत के चलते इस जुए को पुलिस की ओर से हरी झण्डी मिली हुई थी।

Wednesday, December 9, 2009

महंगाई पर हाथ खड़े करती सरकार!

खाद्य पदार्थों के बेतहाशा महंगे होने के कारण देश के गरीब जो यंत्रणा इन दिनों झेल रहे हैं, ऎसी आजादी के बाद पिछले साठ साल में कभी नहीं देखी गई। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि दाल सौ रूपए किलो हो जाएगी और सब्जियों की कीमतें भी आसमान छूने लगेंगी। उस पर विडम्बना यह है कि आम आदमी का हितैषी होने का दम भरने वाले सत्तारू ढ़ संप्रग में एक भी नेता ऎसा नहीं है, जिसने घोर विपत्ति के इस दौर में गरीब के आंसू पोंछने वाली कोई बात कही हो।

इससे भी अधिक विस्मयकारी बात यह है कि जो लोग और पार्टियां विगत में महंगाई के खिलाफ आंदोलन करती रही हैं और खुद को दलितों व गरीबों का मसीहा बताती हैं, वे भी चुप हैं। जनता की याददाश्त कमजोर हो सकती है, लेकिन 1999 में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में प्याज के दाम अचानक बेहद बढ़ जाने के कारण भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी थी। धड़ेबाजी के कारण बेहद कमजोर हो गई भाजपा ने दिल्ली की सड़कों पर महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन किए जरू र, लेकिन वह प्रतीकात्मक बनकर रह गए।

पिछले सप्ताह लोकसभा में इस मुद्दे पर हुई बहस के दौरान सदन में सदस्यों की नाममात्र की उपस्थिति से साफ हो गया कि हमारे राजनेताओं को गरीब की कितनी चिंता है। शरद पवार जब उत्तर देने के लिए खड़े हुए, तो सदन में केवल 26 सदस्य उपस्थित थे। बहस की शुरूआत करने वाले भारतीय जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव भी उस समय सदन में मौजूद नहीं थे।

देश की एक अरब से अधिक आबादी में से गरीब और दलित, जो असहनीय दुख-तकलीफ झेल रहे हैं, उस पर हुई चर्चा में कृषि मंत्री शरद पवार का योगदान क्या है? उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में महंगाई का सारा दोष राज्य सरकारों के सिर मढ़ कर केन्द्र सरकार को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। इससे ज्यादा शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती। क्या महाराष्ट्र में सरकार कांग्रेस और पवार की पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की नहीं है? क्या आन्ध्र से राजस्थान और हरियाणा तक कई अन्य राज्यों में भी कांग्रेस सत्तारू ढ़ नहीं है?

शरद पवार का केन्द्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के रू प में प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। वे इस पद पर 2004 से हैं, लेकिन इस पूृरे कार्यकाल में उन्होंने मंत्री पद की जिम्मेदारी बहुत लापरवाह तरीके से निभाई है, क्योंकि उनके दिमाग में इससे भी महत्वपूर्ण कई चीजें हैं। उदाहरण के लिए, बेहद लुभावने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का नाम लिया जा सकता है। इसके अलावा एनसीपी के एकछत्र नेता पवार अपनी बेटी सुप्रिया सुले को अपना उत्तराधिकारी बनाने की कोशिश में जोर-शोर से लगे हुए हैं।

चीनी और गन्ने की कीमतों के घोटाले में पवार की निंदनीय भूमिका रही है। इसी के चलते मनमोहन सिंह सरकार को हड़बड़ी में अपना कदम वापस लेना पड़ा। राज्यसभा में विपक्ष के कुछ सांसदों ने बेलगाम महंगाई के बारे में केन्द्र सरकार की निष्क्रियता सम्बन्धी पैने और प्रासंगिक प्रश्न पूछे थे। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पूर्व में कह चुके हैं कि महंगाई को काबू में रखने के लिए युद्धस्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं।

केन्द्र सरकार के संकटमोचक की भूमिका कई बार निभा चुके प्रणव मुखर्जी भी इस बहस के दौरान आपा खो बैठे और माकपा नेता वृंदा करात को जोर-जोर से लताड़ने लगे। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि केन्द्र सरकार महंगाई पर काबू पाने के लिए क्या कदम उठा रही है। उन्होंने न जमाखोरों और न मुनाफाखोरों के बारे में कुछ कहना मुनासिब समझा और न तथाकथित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विफल होने के बारे में कुछ कहा। हालांकि उन्होंने दावा किया कि "सरकार जो कुछ कर सकती है, वह कर रही है।" इसके बाद उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दालों की तीस लाख टन कमी के बारे में वह कुछ नहीं कर सकते। क्या इन हालात में सरकार को समय रहते योजना बनाकर कदम नहीं उठाने चाहिए थे? क्या प्रणव बाबू या शरद पवार बताएंगे कि चीनी के दाम तीन गुने कैसे हो गए, जब तीन महीने पहले ही पवार कह रहे थे कि देश में चीनी की बहुतायत है और उसमें से कुछ का निर्यात भी किया जा सकता है?

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज अमीर और गरीब के बीच की खाई अपूर्व है। वर्ष 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के बाद कुछ लोगों का जीवन-स्तर तो सुधरा है, लेकिन 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो रही, उनके बारे में सोचने की फुर्सत लगता है सरकार में बैठे लोगों को है ही नहीं।
इसी तरह 9 प्रतिशत विकास दर भी प्रशंसनीय है, जो मंदी के इस दौर में चीन की उच्चतम विकास दर के बाद दूसरे नम्बर पर है। लेकिन मुश्किल यह है कि संप्रग सरकार मानती है कि ऊंची विकास दर से गरीब स्वाभाविक रूप से लाभान्वित होंगे, क्योंकि उसका लाभ ऊपर से नीचे तक पहुंचेगा।

गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की तादाद भी कुछ घटी है, लेकिन इस बारे में सरकारी आंकड़े दोषपूर्ण हैं, जिसमें मूल्य सूचकांक से खाद्य पदार्थों को बाहर रखा गया है।

यदि एक डॉलर प्रतिदिन आय को गरीबी रेखा का पैमाना माना जाए, तो गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की तादाद कहीं ज्यादा होगी। आज खाद्य पदार्थों की कीमतें जिस स्तर पर हैं, उनका फिलहाल नीचे आना संभव नहीं लगता, जिसकी वजह से गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को भी मुश्किलें हो रही हैं। आज तो मध्यम वर्ग के भी अनेक परिवार ऎसे हैं, जो दाल-सब्जियां खरीदने की हैसियत में नहीं रहे। उभरते भारत के लिए इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है?

Wednesday, May 6, 2009

वापस लाएं काला धन

स्विस बैंकों में भारत की अवैध रूप से कुल जमाराशि शेष दुनिया के देशों के कुल काले धन से भी ज्यादा है। एक आकलन के अनुसार भारत का 70 लाख करोड रूपया इन बैंकों में जमा है। अमरीका की तरह अगर यह राशि भारत में वापस आ जाती है तो देश के हर गरीब परिवार को 10 लाख रूपए मिलेंगे। आर्थिक मंदी और बराक ओबामा की ऎतिहासिक सफलता ने दुनिया का एक भला कर दिया। अमरीका ने स्विस बैंकों पर दबाव डालकर अपने देश के 250 ऎसे धनाढ्य लोगों के गोपनीय खाते खुलवा लिए, जिन्होंने स्विट्जरलैंड के यू. बी. एस. बैंक में 3120 करोड रूपए अवैध रूप से जमा कर रखे थे। दुनिया के पांच देशों का नाम काला धन जमा करने वालों में सबसे ऊपर है। ये हैं भारत, रूस, ब्रिटेन, उक्रेन व चीन। आश्चर्य की बात ये है कि इस सूची में न सिर्फ भारत का नाम सबसे ऊपर है बल्कि भारत की स्विस बैंकों में अवैध रूप से कुल जमाराशि शेष दुनिया के देशों के कुल काले धन से भी ज्यादा है। एक आकलन के अनुसार भारत का 70 लाख करोड रूपया इन बैंकों में जमा है। अमरीका की तरह अगर यह धन भारत में वापस आ जाता है तो भारत के हर गरीब परिवार को 10 लाख रूपए मिलेंगे। यह धन आने से भारत की गरीबी मिट जाएगी और देश विदेशी ऋण से भी मुक्त हो जाएगा। इतनी बडी रकम का अवैध रूप से बाहर जाना यह सिद्ध करता है कि आजादी के बाद भारत के नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों, क्रिकेट और फिल्मी सितारों, ड्रग माफियाओं आदि ने देश को लूट-लूटकर ही अकूत दौलत विदेशों में जमा की है। दरअसल स्विस बैंकों का काम करने का तरीका इतना गोपनीय रहा है कि दाहिने हाथ को पता नहीं चलता कि बांया हाथ क्या कर रहा है इसलिए भारत के ये भ्रष्ट धनाढ्य अपना अवैध धन स्विस बैंकों में जमा करवाते रहे हैं। बैंक के मैनेजर और कर्मचारियों तक को नहीं पता होता कि किस खाते में किस व्यक्ति की रकम है। इस व्यवसाय के जानकार बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपनी अकूत दौलत स्विस बैंक में जमा करने जाता है तो वह बैंक के मैनेजर से संपर्क करता है। यदि मैनेजर को लगता है कि यह ग्राहक ठीक-ठाक है तो वह उसे बैंक के दो ऎसे अधिकारियों से मिलवा देता है जो उस व्यक्ति का खाता खुलवाने का काम करते हैं। ये दो या तीन व्यक्ति उन अधिकारियों में से होते हैं जिनकी विश्वसनीयता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। इन्हें नए खाताधारी का बैंकिंग सचिव कहा जाता है। सब कागजात पूरे हो जाने के बाद खाताधारी को स्विस बैंक का एकाउंट नम्बर दे देते हैं। किन्तु अपनी फाइल में असली खाता नंबर न डालकर एक कोड नाम डाल देते हैं। मसलन अगर खाता खोलने वाले का नाम राजकुमार लालवानी है तो उसके खाते का नंबर हो सकता है प्रिंस रेड 98, खाते का नंबर ग्राहक को बताने के बाद उसका कोड फिर बदल दिया जाता है और अब सम्बंधित बैंकिंग सचिव इस खाते से सम्बंधित फाइल को बंद करके एक ऎसे कक्ष में ले जाते हैं जहां काउंटर के ऊपर धुंधले कांच की दीवार बनी होती है। इस दीवार की तली में जो बारीक-सी झिरि होती है उसमें से होकर नए खातेदार की यह गोपनीय फाइल दूसरी तरफ सरका दी जाती है। दूसरी तरफ जो व्यक्ति उस फाइल को लेता है उसे यह नहीं पता होता कि यह फाइल किसकी है और शीशे के बाहर से फाइल देने वाले बैंकिंग सचिवों को यह नहीं पता होता कि शीशे की दीवार के पीछे इस फाइल को किसने लेकर लॉकर में रखा है। इस तरह नए खातेदार के खाते से सम्बंधित जो पांच-छह लोग होते हैं उनमें से किसी को भी पूरी जानकारी नहीं होती। मजे की बात तो यह है कि स्विस बैंक में धन जमा करने वालों को ब्याज मिलना तो दूर इसके उलट धन के संरक्षण के लिए उन्हें नियमित फीस देनी होती है। इस तरह स्विट्जरलैंड में अथाह धन जमा हो गया है। स्विट्जरलैंड के लोगों को अब इस बात का अहसास हुआ कि दुनिया भर में गरीबी, कुपोषण व भूख बढती जा रही है। दुनिया के तमाम देशों के भ्रष्ट नेता और नौकरशाह अपने भ्रष्ट आचरण के कारण जनता को दुख दे रहे हैं। जब दुनिया भर के अपराधी स्विट्जरलैंड में चोरी का धन छुपाएंगे तो स्विट्जरलैंड इस अनैतिकता के पाप का भागीदार बने बिना नहीं रह सकता। ऎसे विचारों ने स्वीट्जरलैंड के नागरिकों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया। इसके साथ ही दुनियाभर में स्विस बैंकों के खातों के प्रति जागरूकता और उनमें अवैध रूप से जमा अपने देश का धन वापस देश में लाने की मांग कई देशों में उठने लगी। इस सबका नतीजा यह हुआ कि स्विस नागरिकों ने अपने संविधान में संशोधन किया। चूंकि स्विट्जरलैंड दुनिया का सबसे परिपक्व लोकतंत्र है इसलिए वहां हर कानून बनने के पहले जनता का आम मतदान कराया जाता है। बहुमत मिलने पर ही कानून बन पाता है। इसलिए जब स्विस नागरिकों को नैतिक दायित्व का एहसास हुआ तो उन्होंने एक कानून बनाया जिसके अनुसार अब स्विस बैंकों में खोले गए खाते गोपनीय नहीं रहे। स्विट्जरलैंड की या अन्य किसी भी देश की सरकारें इन खातों की जानकारी प्राप्त कर सकती हंै। इसके लिए करना सिर्फ यह होगा कि संबंधित देश को उस व्यक्ति के खिलाफ, जिसके स्विस खाता होने का संदेह है, एक आपराधिक मामला दर्ज करना होगा। इसके बाद उस देश की सरकार स्विट्जरलैंड की सरकार को आधिकारिक पत्र लिखेगी जिसमें उस व्यक्ति के विरूद्ध दर्ज आपराधिक मामले का हवाला देते हुए स्विट्जरलैंड की सरकार से अनुरोध करेगी कि वह पता करके बताए कि उस व्यक्ति का कोई गोपनीय खाता स्विट्जरलैंड के बैंकों में तो नहीं है इस पत्र के प्राप्त हो जाने के बाद स्विट्जरलैंड की सरकार सभी बैंकों को इस पत्र की प्रतिलिपियां भेजेगी और उन बैंकों से यह जानकारी मांगेगी। अगर किसी बैंक में सम्बंधित व्यक्ति का गोपनीय खाता चल रहा होगा तो बैंक को उसकी पूरी जानकारी अपनी सरकार को देनी होगी। यह आश्चर्य की बात है कि ईमानदारी का ढिंढोरा पीटने वाले हमारे पिछले कई प्रधानमंत्रियों ने स्विस बैंकों से यह जानकारी मांगने की पहल नहीं की, जबकि अन्य कई देश ये पहल कर चुके हैं। भारत से लगभग 80 हजार लोग हर वर्ष स्विट्जरलैंड जाते हैं। इनमें 25 हजार लोग ऎसे हैं जो साल में कई बार दौरा करते हैं। ऎसे लोगों पर खुफिया जांच करके इनके चाल-चलन से इनके बैंकों तक पहुंचा जा सकता है। ओबामा की पहल से पे्ररित होकर इस चुनाव के पहले भारत में स्विस बैंकों से काला धन वापस लाने के लिए एक माहौल बनाया जा रहा है, जो शुभ लक्षण है। पर यह माहौल वे लोग बना रहे हैं जिनका लक्ष्य काला धन वापस लाना नहीं बल्कि प्रधानमंत्री पर हमला बोलना है। ये सिद्ध करना चाहते हैं कि व्यक्तिगत जीवन में ईमानदार रहने वाले प्रधानमंत्री इतने बडे मुद्दे पर बेईमानों को संरक्षण दे रहे हैं। इससे ज्यादा गम्भीरता इस अभियान की नहीं है।

Saturday, February 21, 2009

"कठघरे" में न्याय 
 

इ स देश का दुर्भाग्य कहना चाहिए कि जनप्रतिनिधि से लेकर नौकरशाह तक आपराधिक मामलों में फंसे हैं। वे नहीं चाहते कि अदालतें मामलों का निपटारा समय पर करें, क्योंकि इससे उनकी खुद की गर्दन फंस जाएगी। जितनी देरी होगी उतने में वे गवाह को तोडने, जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे हथकण्डे अपनाकर खुद के बच निकलने का रास्ता निकाल लेते हैं। लेकिन कई सालोें से इस सवाल को उलझा कर रखने वाले अब थोडा दबाव महसूस करने लगे हैं। आम लोगों की आवाज अनसुनी करने का मतलब उन्हें समझ में आने लगा है, ऊपर से जनता के साथ विकास में भागीदार बन रहे विदेशी निवेशक और औद्योगिक घरानों का स्वर भी मिल गया है, ऎसे में व्यवस्थागत बदलाव की तरफ थोडा सोच बनती दिख रही है। 

के. टी. एस. तुलसी 
पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल
भारतीय संविधान को इतना पैना बनाया गया है कि उसमें बेगुनाह फंसने से बचाने और गुनहगार के किसी भी तरह से नहीं बच पाने के पूरे प्रावधान रखे गए हैं। भारतीय संविधान में सबको समय पर न्याय की अवधारणा के तहत ही मामले के निपटारे की मियाद सुनिश्चित की गई थी, परन्तु इतने अच्छे प्रावधान, सख्त कानून के बाद भी भारत में अपराधों की संख्या में इतना इजाफा हो गया कि समूची न्याय व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे। देश में इस मसले पर खूब बहस चली। बुद्धिजीवी हों या सामान्य जन कई मंचों से यह सवाल उठे। जनाक्रोश बढता देख सरकारों ने संविधान में बदलाव करके कानून और कडा करने का संदेश देकर जनता को यह संदेश दिया कि उनकी चिंताओं से सरकार भी चिंतित है।

नेता डरते हैं, सुधार करने से 
ऎसा नहीं है कि देश को चलाने वालों को इसका उपाय पता नहीं है। उन्हें तकनीक मालूम है जिससे अपराधियों के मन में भय पैदा किया जा सके, लेकिन उस पर अमल इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि इससे खुद राजनीतिज्ञ और नौकरशाहों के मन में डर भरा हुआ है। कई सालोें से इस सवाल को उलझा कर रखने वाले अब दबाव महसूस करने लगे हैं। आम लोगों की आवाज अनसुनी करने का मतलब उन्हें समझ में आने लगा है, ऊपर से जनता के साथ विकास में भागीदार बन रहे विदेशी निवेशक और औद्योगिक घरानों का स्वर भी मिल गया है, ऎसे में व्यवस्थागत बदलाव की तरफ थोडा सोच बनती दिख रही है। 

अपराधियों को लाभ
भारत में वर्गीकृत दण्ड का प्रावधान इसी मकसद से किया गया था कि अपराधियों के मन में कानून के प्रति डर बना रहे और वह अपराध करने से पहले सख्त सजा से घबराकर अपने कदम खींच ले। आजादी के बाद कुछ साल तक ऎसा हुआ, परन्तु समय के साथ न्यायिक जांच प्रक्रिया इतनी जटिल होती गई कि तीन से छह माह में निपटारा हो जाने वाले मामलों में पांच से दस साल लगने लगे। इसका दुष्परिणाम ये रहा कि पेचीदा जांच, लम्बी बहस और रोज कोर्ट से बुलावा के कारण गवाह तंग होने लगा या टूटने लगा। इसका फायदा अपराधियों को मिला।

पद्धति बदलें, समस्या हल
इस देश में कानून बदलने की बजाय यदि अदालतों की सौ साल पुरानी पद्धति को बदल दिया जाए तो बहुत सारी दिक्कत अपने आप हल हो जाएगी। कम कर्मचारियों वाले अदालत में मुकदमोें का भण्डार लगा है। किसी को यह देखने की फुर्सत नहीं है कि अदालतें किस आभाव में काम कर रही हैं। उनके पास जरूरी साजोसमान है अथवा नहीं। ऎसे में समयबद्ध मामले के निपटारे की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आज अदालतों का आधुनिकीकरण सबसे बडी जरूरत है। पुरानी परम्परा को त्यागकर हमें अदालतों को ऎसे आधुनिक साजोसमान उपलब्ध कराने होंगे जिससे धीमी गति को रफ्तार दी जा सके। 

तकनीक का करें इस्तेमाल
सभी अदालतों के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत है। अदालतों में आडियो विजुअल रिर्काडिंग सिस्टम लगाया जाना चाहिए। जिससे गवाही, बहस सहित सभी जरूरी बातों को लिखने में जाया होने वाले समय को बचाया जा सके। सभी अदालतों में कम्प्यूटर, शार्ट हैण्ड मशीन जैसे बेहतर उपकरण होने से बहुत समय बचाया जा सकता है। लेकिन इस तरफ कभी ध्यान नहीं दिया गया। इस देश का दुर्भाग्य कहना चाहिए कि जनप्रतिनिधि से लेकर नौकरशाह तक ऎसे मामलों में फंसे हुए हैं कि वे खुद नहीं चाहते कि अदालतें मामलों का निपटारा समय पर करें, क्योंकि उससे उनकी खुद की गर्दन फंस जाएगी। जितनी देरी होगी उतने में गवाह को तोडने, जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे हथकण्डे अपनाकर खुद के बच निकलने का रास्ता निकाल लेते हैं। ऎसे में कानून पर अंगुली उठानेे की बजाय हमें वास्तविकता समझनी होगी। सरकारों की यह वास्तविकता अब उजागर होने लगी है।

वास्तविकता समझनी होगी
पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि सरकार जागी है। इस हलचल का कारण विदेशी निवेशकों, औद्योगिक घरानों के दबाव को माना जा रहा है। परन्तु अभी सरकार पर उस तरीके का दबाव नहीं पड रहा कि वह जल्दी हरकत में आए। हालांकि भारतीय न्याय प्रणाली को पटरी में लाने में वक्त लगेगा, लेकिन जिसमें सुधार की सम्भावना नहीं दिख रही थी, उसमें यह पहल उम्मीद जगाती है। 
-जैसा उन्होंने राकेश शुक्ला को बताया

जरूरत है भ्रष्टाचार से लडने की 
1946 से वकालत के साथ ही राजनीति से भी जुड गया था। स्वतंत्रता के करीब तीन साल बाद देश में गणतंत्र की स्थापना के बाद पहला समारोह नागौर के मानासर चौराहे के पास हुआ। तब हम लोग इस समारोह में उत्साह से शामिल हुए। हर जगह गणतंत्र की बदौलत नागरिकों को हासिल हुए अधिकारों की गंूज थी। सभी को गर्व था कि हमारा संविधान बन गया है, जो हमारे अधिकारों की रक्षा करेगा। करीब सात साल बाद तब और खुशी हुई जब 2 अक्टूबर 1959 को प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागौर से ही पंचायतीराज की नींव रखी। इसका नतीजा था कि 1959 में पंचायती राज संस्थाओं के हुए चुनाव में मुझे मूण्डवा से निर्विरोध प्रधान चुना गया। इसके 15-20 दिन बाद मुझे नागौर का प्रथम जिला प्रमुख बनने का गौरव हासिल हुआ। तब हमारी सोच थी कि गांवों में विकास के साथ ही ग्रामीणों को शिक्षित कर राष्ट्र के विकास में भागीदार बनाया जाए। तरक्की तो आज भी हो रही है, लेकिन इसमें स्वार्थ और भ्रष्टाचार ज्यादा है। मुझे याद है सभी सदस्यों ने तय किया कि जिला परिषद का भवन बनवाया जाए। इसके लिए हमने तत्कालीन प्रशासन से मशविरा किया तो निर्णय हुआ कि पंचायतों को सीमित फण्ड मिलता है, इसलिए आपसी सहयोग से जिला परिषद का भवन बनवाया जाए। हमने किया भी यही। उस समय के राजनेता अच्छे थे और अच्छे लोगों को राजनीति में लाने की पहल करते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद नागौर आए मोहनलाल सुखाडिया ने कहा था कि अच्छे लोगों को हमेशा सहयोग करो, वे आपके काम को याद रखेंगे। आज ऎसा नहीं है। लोगों की नजर में स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस औपचारिकता बनकर रह गए हैं। इसी कारण मैंने 1975 में राजनीति को अलविदा कर दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू का सपना था कि पंचायत राज व्यवस्था के जरिए गांव और उनमें रहने वाले पिछडे लोगों का विकास हो और गणतंत्र मजबूत हो, लेकिन यह सपना पूर्ण रूप से साकार नहीं हो पाया। 70 के दशक के बाद भ्रष्टाचार की फैलती जडों ने इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला करना शुरू कर दिया। यह भ्रष्टाचार बाद के सालों में बढता ही गया। आज युवाओं को इस भ्रष्टाचार से लडने की जरूरत है। बदमाशी करने वाले लोगों को दण्डित किया जाए और गरीब का सम्मान हो, तभी पूरा होगा गणतंत्र का मकसद। 
-जैसा लिखमाराम चौधरी ने 
इंशाद खान को बताया

माया की "माया"
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का मामला पांच साल से लम्बित है। सीबीआई ने वष्ाü 2003 में यह मामला दर्ज किया था। अब सीबीआई ने कोर्ट को बताया है कि अकबरपुर से लोकसभा चुनाव लडते समय उन्होंने एक करोड रूपए की सम्पत्ति बताई थी जो वर्ष 2007 में बढ कर पचास करोड हो गई है। मायावती के मुताबिक कार्यकर्ताओं से जन्मदिन पर मिले चन्दे की राशि से उनका धन बढा है। 

मुलायम भी कम नहीं
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह पर भी आय से अधिक सम्पत्ति का मामला लम्बित है। इस मामले में सीबीआई इसी महीने अपने ढुलमुल रवैये को लेकर उ“ातम न्यायालय से फटकार खा चुकी है। मार्च-07 में एक जनहित याचिका पर न्यायालय के आदेश से मुलायम, उनके पुत्रों व पुत्रवधू के खिलाफ जांच शुरू हुई थी। सीबीआई ने दो सप्ताह पहले हुई सुनवाई के दौरान अदालत से रिपोर्ट पेश करने के लिए फिर समय मांग लिया। 

जो अटके सो लटके
देश की अदालतों में ऎसे मामलों की लम्बी फेहरिस्त है जो एक बार अटके तो दस, पन्द्रह, बीस साल से लटके हुए हंै। हर्षद मेहता काण्ड, बाबरी मस्जिद काण्ड, 84 के दंगों का मामला और ऎसे ही न जाने कितने बडे और चर्चित मामले तो आम लोगों को याद तक हो चुके हैं। चन्दमिसालें यहां फिर याद दिला देते हैं...

84 के दंगे
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या के बाद देशभर में फैले सिख विरोधी दंगों के पीडितों को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। अनेक आयोग बने लेकिन प्रमुख कर्ताकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाई। पूर्व मंत्री जगदीश टाइटलर के खिलाफ एक याचिका अब भी दिल्ली की अदालत में चल रही है। सीबीआई ने इसी महीने अदालत में आवेदन दायर कर अंतिम स्टेटस रिपोर्ट दायर करने के लिए तीस दिन का समय मांगा है। उडीसा ने हाल ही में उस समय के पीडितों के लिए मुआवजा राशि जारी की है।

बाबरी ढांचा विध्वंस
वर्ष 1992 में अयोध्या में बाबरी ढांचे को तोडने को लेकर राम जन्मभूमि पुलिस चौकी पर दर्ज मामले की सुनवाई अब तक गति नहीं पकड पाई है। राज्य पुलिस से मामला सीबीआई के पास पहुंचा और सीबीआई ने वष्ाü1993 में आरोप पत्र दायर किया लेकिन आरोप तय हो पाए बारह साल बाद। उ“ातम न्यायालय ने वर्ष 2005 में यह मामला रायबरेली हस्तांतरित किया था। चौकी पर एफआईआर दर्ज करने वाले एएसआई हनुमान प्रसाद और तब वहां तैनात सीआरपीएफ के डिप्टी कमाण्डेन्ट आर. के. स्वामी के ही बयान हो पाए हैं।

भागलपुर दंगे
बिहार के भागलपुर और आस-पास के इलाके में 1989 में दंगे भडक उठे थे। आधिकारिक आंकडों के अनुसार दंगों में कुल 1070 लोग मारे गए। उ“ा न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रामचन्द्र प्रसाद सिन्हा और शमसुल हसन के जांच आयोग ने पुलिस एवं प्रशासन के 14 अधिकारियों को दोषी बताया लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। दंगों को लेकर 142 एफआईआर दर्ज हुई जिनमें से कुछ में दो साल पहले तक सुनवाई चलती रही। कुछ अभियुक्तों को सजा हो पाई है। केन्द्र ने जून 2008 में मुआवजा स्वीकृत किया। 

चारा घोटाला
बिहार में पन्द्रह साल पहले यह घोटाला उजागर हुआ जिसमें चारे के नाम पर 950 करोड रूपए की हेरफेर की गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव पर भी आरोप लगे। उ“ातम न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने जांच के बाद यादव सहित अनेक राजनेताओं को मामले में लिप्त बताया। बाद में लालू यादव को इस्तीफा देना पडा। इस घोटाले को लेकर दर्जनों एफआईआर दर्ज हुए जिनमें से कुछ की सुनवाई पूरी होकर कुछ अभियुक्तों को सजा हो गई है लेकिन अनेक मामले अब भी अदालतों में लम्बित हैं।

हर्षद मेहता घोटाला
वर्ष 1991-92 में शेयर मार्केट में हुए इस बडे घोटाले ने हजारों लोगों को बर्बाद कर दिया। शेयर मार्केट का यह पहला बडा घोटाला था। दस हजार करोड रूपए के इस सिक्योरिटी घोटाले में मेहता के साथ अनेक बैंकों के अधिकारी शामिल थे। उस समय लिस्टेड कम्पनियों में से एक हजार से ऊपर का तो नामोनिशान तक नहीं बचा है। मुम्बई में वर्ष 1992 में इस मामले को लेकर स्थापित हुई विशेष अदालत 16 साल गुजरने के बाद भी सुनवाई कर रही है। हालांकि हर्षद मेहता की मौत हो चुकी है।